बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 261, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 261
ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ २५५
| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पत्तिः स्यादिति चेत् ? | प्राप्ति हो सकती है-ऐसा मानें तो ? |
| न, सम्पत्तेः प्रत्ययमात्रत्वात् । विज्ञानस्य च मिथ्याज्ञाननिवर्त्तकत्वव्यतिरेकेणाकारकत्वमित्यवोचाम । न च वचनं वस्तुनः सामर्थ्यजनकम् । ज्ञापकं हि शास्त्रं न कारकमिति स्थितिः । "स एष इह प्रविष्टः” (बृ० उ० १ । ४ । ७) इत्यादिवाक्येषु च परस्यैव प्रवेश इति स्थितम् । तस्माद्ब्रह्मेति न ब्रह्मभाविपुरुषकल्पना साध्वी । | सिद्धान्ती-ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि सम्पत्ति तो केवल प्रत्यय (प्रतीति) मात्र होती है। विज्ञान तो मिथ्या ज्ञानका निवर्त्तक होनेके सिवा और कुछ करनेवाला है नहीं-ऐसा हम पहले कह चुके हैं। शास्त्र-वचन किसी वस्तुमें कोई सामर्थ्य पैदा करनेवाला नहीं होता, क्योंकि शास्त्र केवल ज्ञापक है कारक नहीं-यही वास्तविक स्थिति है। "वह यह ब्रह्म इसमें प्रविष्ट हुआ” इत्यादि वाक्योंमें परमात्माका ही [ शरीरमें ] प्रवेश निश्चय किया गया है। अतः 'ब्रह्म' यह ब्रह्मभावी पुरुषका वाचक है-ऐसी कल्पना करना ठीक नहीं है। |
| इष्टार्थबाधनाच्च । सैन्धवघनवदनन्तरमबाह्यमेकरसं ब्रह्मेति विज्ञानं सर्वस्यामुपनिषदि प्रतिपिपादयिषितोऽर्थः। काण्डद्वयेऽप्यन्तेऽवधारणादवगम्यते "इत्यनुशासनम्” “एतावदरे खल्वमृतत्वम्” इति । | इसके सिवा इष्ट अर्थका बाध होनेके कारण भी [ इससे ब्रह्मभावी पुरुष अभिप्रेत नहीं है ]। नमकके डलेके समान ब्रह्म अविच्छिन्न, अबाह्य और एकरस है-यह विज्ञान ही समस्त उपनिषदोंमें प्रतिपादनके लिये अभीष्ट विषय है। "इत्यनुशासनम्” और “एतावदरे खल्वमृतत्त्वम्” इन वाक्योंसे इस उपनिषद्के दो काण्डोंके अन्तमें निर्णय करनेसे भी यही ज्ञात होता है। |
१. मधुकाण्ड ( अ० २ ब्रा० ५ ) और मुनिकाण्ड ( अ० ४ ब्रा० ५ ) ।