बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| २०६-निष्पाप और निष्काम श्रोत्रियके सार्वभौम आनन्दका दिग्दर्शन | १००४ |
| २०७-सम्बन्ध-भाष्य | १०११ |
| २०८-आत्माकी संसाररूप जागरित-स्थानमें पुनरावृत्ति | १०१३ |
| २०९-मुमूर्षु की दशाका वर्णन | १०१४ |
| २१०-ऊर्ध्वोच्छ्वास क्यों और किसलिये होता है ? | १०१६ |
| २११-देहान्तरग्रहणका प्रकार | १०२० |
| २१२-प्राणोंके देहान्तरगमनका प्रकार | १०२२ |
| चतुर्थ ब्राह्मण | |
| २१३-मरणोन्मुख जीवकी दशाका वर्णन | १०२४ |
| २१४-लिङ्गात्मामें विभिन्न इन्द्रियोंके लय और उसके उत्क्रमणका वर्णन | १०२८ |
| २१५-देहान्तरगमनमें जोंकका दृष्टान्त | १०३७ |
| २१६-आत्माके देहान्तरनिर्माणमें सुवर्णकारका दृष्टान्त | १०३६ |
| २१७-सर्वमय आत्माकी कर्मानुसार विभिन्न गतियोंका निरूपण | १०४१ |
| २१८-कामनाके अनुसार शुभाशुभ गति तथा निष्काम ब्रह्मज्ञके मोक्षका निरूपण | १०४८ |
| २१९-विद्वान्का अनुत्क्रमण | १०६५ |
| २२०-आत्मकामी ब्रह्मवेत्ताको मोक्ष प्राप्त होता है— इसमें प्रमाणभूत मन्त्र | १०७० |
| २२१-मोक्षमार्गके विषयमें मत-भेद | १०७३ |
| २२२-विद्या और अविद्यारत पुरुषोंकी गति | १०७७ |
| २२३-अज्ञानियोंको प्राप्त होनेवाले अनन्द लोकोंका वर्णन | १०७८ |
| २२४-आत्मज्ञकी निश्चिन्त स्थिति | १०७८ |
| २२५-आत्मज्ञका महत्त्व | १०८० |
| २२६-आत्मज्ञानके बिना होनेवाली दुर्गति | १०८२ |
| २२७-अभेददर्शी आत्मज्ञकी निर्भयता | १०८४ |
| २२८-देवोंद्वारा उपास्य आयुसंज्ञक ब्रह्म | १०८५ |
| २२९-सर्वाधारभूत ब्रह्मको जाननेवाला मैं अमृत ही हूँ | १०८६ |
| २३०-ब्रह्मको प्राणका प्राणादि जाननेवाले ही उसे जानते हैं | १०८७ |
| २३१-नानात्वदर्शीकी दुर्गतिका वर्णन | १०८८ |
| २३२-ब्रह्मदर्शनकी विधि | १०८८ |
| २३३-ब्रह्मनिष्ठामें अधिक शास्त्राभ्यास बाधक है | १०९१ |
| २३४-आत्माके स्वरूप, उसकी उपलब्धिके साधनभूत संन्यास और आत्मज्ञकी स्थितिका प्रतिपादन | १०९६ |