बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 25, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 25
( २१ )
| विषय | पृष्ठ |
|---|---|
| १८५—वामनेत्रस्थ इन्द्रपत्नी तथा विराट्का परिचय और उन दोनोंके संस्ताव, अन्न, प्रावरण एवं मार्गादिका वर्णन | ... ८६१ |
| १८६—प्राणात्मभूत विद्वान्की सर्वात्मकताका वर्णन, जनककी अभयप्राप्ति और याज्ञवल्क्यके प्रति आत्मसमर्पण | ... ... ८६४ |
| तृतीय ब्राह्मण | |
| १८७—जनकके पास याज्ञवल्क्यका आना और राजाका पहले प्राप्त किये हुए इच्छानुसार प्रश्नरूप वरके कारण उनसे प्रश्न करना | ... ८७० |
| १८८—पुरुषके व्यवहारमें उपयोगी पाँच ज्योतियाँ | |
| १—आदित्यज्योति | ... ... ... ८७१ |
| २—चन्द्रज्योति | ... ... ... ८७५ |
| ३—अग्निज्योति | ... ... ... ८७५ |
| ४—वाग्ज्योति | ... ... ... ८७६ |
| ५—आत्मज्योति | ... ... ... ८७८ |
| १८९—आत्माका स्वरूप | ... ... ... ८८१ |
| १९०—आत्मा जन्म और मरणके साथ देहेन्द्रियरूप पापको ग्रहण और त्याग करता है | ... ... ... ८९१ |
| १९१—आत्माके दो स्थानोंका वर्णन | ... ... ... ८९३ |
| १९२—स्वप्नावस्थामें रथादिका अभाव है, इसलिये उस समय आत्मा स्वयं ज्योति है | ... ... ... ९३० |
| १९३—स्वप्नसृष्टिके विषयमें प्रमाणभूत मन्त्र | ... ... ९३५ |
| १९४—स्वप्नस्थानके विषयमें मतभेद और उसके स्वयंज्योतिष्ट्वका निश्चय | ... ९३८ |
| १९५—सुषुप्तिके भोगसे आत्माकी असङ्गता | ... ... ९४४ |
| १९६—स्वप्नावस्थाके भोगोंसे आत्माकी असङ्गता | ... ... ९५० |
| १९७—जागरित-अवस्थाके भोगोंसे आत्माकी असङ्गता | ... ९५२ |
| १९८—पुरुषके अवस्थान्तर-सञ्चारमें महामत्स्यका दृष्टान्त | ... ९५६ |
| १९९—सुषुप्ति आत्माका विश्रान्तिस्थान है, इसमें श्येनका दृष्टान्त | ... ९५६ |
| २००—स्वप्नदर्शनकी स्थानभूता हितानाम्नी नाड़ियोंका वर्णन | ... ९६१ |
| २०१—मोक्षका स्वरूप प्रदर्शित करनेमें स्त्रीसे मिले हुए पुरुषका दृष्टान्त | ... ९६८ |
| २०२—सुषुप्तिस्थ आत्माकी निःसङ्ग और निःशोक स्थितिका वर्णन | ... ९७४ |
| २०३—सुषुप्तिमें स्वयंज्योति आत्माकी दृष्टि आदिका अनुभव न होनेमें हेतु | ९८५ |
| २०४—जागरित और स्वप्नमें पुरुषको विशेष ज्ञान होनेमें हेतु | ... ९८६ |
| २०५—सुषुप्तिगत आत्माकी अभिन्न स्थिति | ... ... १००० |