भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

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विषयपृष्ठ
१८५—वामनेत्रस्थ इन्द्रपत्नी तथा विराट्‌का परिचय और उन दोनोंके संस्ताव, अन्न, प्रावरण एवं मार्गादिका वर्णन... ८६१
१८६—प्राणात्मभूत विद्वान्‌की सर्वात्मकताका वर्णन, जनककी अभयप्राप्ति और याज्ञवल्क्यके प्रति आत्मसमर्पण... ... ८६४
तृतीय ब्राह्मण
१८७—जनकके पास याज्ञवल्क्यका आना और राजाका पहले प्राप्त किये हुए इच्छानुसार प्रश्नरूप वरके कारण उनसे प्रश्न करना... ८७०
१८८—पुरुषके व्यवहारमें उपयोगी पाँच ज्योतियाँ
१—आदित्यज्योति... ... ... ८७१
२—चन्द्रज्योति... ... ... ८७५
३—अग्निज्योति... ... ... ८७५
४—वाग्ज्योति... ... ... ८७६
५—आत्मज्योति... ... ... ८७८
१८९—आत्माका स्वरूप... ... ... ८८१
१९०—आत्मा जन्म और मरणके साथ देहेन्द्रियरूप पापको ग्रहण और त्याग करता है... ... ... ८९१
१९१—आत्माके दो स्थानोंका वर्णन... ... ... ८९३
१९२—स्वप्नावस्थामें रथादिका अभाव है, इसलिये उस समय आत्मा स्वयं ज्योति है... ... ... ९३०
१९३—स्वप्नसृष्टिके विषयमें प्रमाणभूत मन्त्र... ... ९३५
१९४—स्वप्नस्थानके विषयमें मतभेद और उसके स्वयंज्योतिष्ट्वका निश्चय... ९३८
१९५—सुषुप्तिके भोगसे आत्माकी असङ्गता... ... ९४४
१९६—स्वप्नावस्थाके भोगोंसे आत्माकी असङ्गता... ... ९५०
१९७—जागरित-अवस्थाके भोगोंसे आत्माकी असङ्गता... ९५२
१९८—पुरुषके अवस्थान्तर-सञ्चारमें महामत्स्यका दृष्टान्त... ९५६
१९९—सुषुप्ति आत्माका विश्रान्तिस्थान है, इसमें श्येनका दृष्टान्त... ९५६
२००—स्वप्नदर्शनकी स्थानभूता हितानाम्नी नाड़ियोंका वर्णन... ९६१
२०१—मोक्षका स्वरूप प्रदर्शित करनेमें स्त्रीसे मिले हुए पुरुषका दृष्टान्त... ९६८
२०२—सुषुप्तिस्थ आत्माकी निःसङ्ग और निःशोक स्थितिका वर्णन... ९७४
२०३—सुषुप्तिमें स्वयंज्योति आत्माकी दृष्टि आदिका अनुभव न होनेमें हेतु९८५
२०४—जागरित और स्वप्नमें पुरुषको विशेष ज्ञान होनेमें हेतु... ९८६
२०५—सुषुप्तिगत आत्माकी अभिन्न स्थिति... ... १०००