बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 276, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| २७० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| एषां हि फलसम्पत्तिविपत्तिहेतुत्वं शास्त्रे लोके च प्रसिद्धम्। अतोऽप्यनाश्वासः शास्त्रार्थानुष्ठाने। | लोकमें फलकी प्राप्ति या अप्राप्तिमें इनकी हेतुता प्रसिद्ध ही है। इसलिये भी शास्त्राज्ञाके अनुष्ठानमें अविश्वास ही रहेगा। | | न; सर्वपदार्थानां नियतनिमित्तोपादानात्,<br><br>तन्निराक्रियते<br><br>जगद्वैचित्र्यदर्शनाच्च। स्वभावपक्षे च तदुभयानुपपत्तेः। 'सुखदुःखादिफलनिमित्तं कर्म' इत्येतस्मिन्पक्षे स्थिते वेदस्मृतिन्यायलोकपरिगृहीते, देवेश्वरकालास्तावन्न कर्मफलविपर्यायकर्तारः, कर्मणां काङ्क्षितकारकत्वात्। कर्म हि शुभाशुभं पुरुषाणां देवकालेश्वरादिकारकमनपेक्ष्य नात्मानं प्रति लभते, लब्धात्मकर्मापि फलदानेऽसमर्थम्, क्रियाया हि कारकाद्यनेकनिमित्तोपादानस्वाभाव्यात्। तस्मात्क्रियानुगुणा हि देवेश्वरा- | समाधान—ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि सभी पदार्थोंके निश्चित कारण ग्रहण किये जाते हैं तथा जगत्में सुख-दुःखादिवैचित्र्य भी देखा जाता है। यदि इन्हें स्वाभाविक माना जाय तो ये दोनों बातें होनी सम्भव नहीं हैं। 'सुख-दुःखादि फलका निमित्त कर्म है' इस वेद, स्मृति, न्याय और लोकद्वारा गृहीत पक्षके निश्चित होनेपर यह निर्विवाद सिद्ध होता है कि देवता, ईश्वर और काल तो कर्मफलका विपर्यय करनेवाले हैं नहीं, क्योंकि वे तो कर्मानुष्ठानके अपेक्षित कारक हैं—देव, काल और ईश्वरादि कारकोंकी अपेक्षा न करके तो मनुष्योंका शुभाशुभ कर्म स्वतः सम्पन्न ही नहीं हो सकता। यदि सम्पन्न हो भी जाय तो वह फल देनेमें समर्थ नहीं होगा, क्योंकि कारकादि अनेकों निमित्तोंको ग्रहण करना क्रियाका स्वभाव ही है। अतः देवता और ईश्वरादि कर्मके गुणका अनुसरण करनेवाले ही हैं, इसलिये |