बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 277, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 277
ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ २७१
| संस्कृत | हिन्दी |
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| दय इति कर्मसु तावन्न फलप्राप्तिप्रत्ययविस्रम्भः ।<br>कर्मणामप्येषां वशानुगत्वं क्वचित्, स्वसामर्थ्यस्याप्रणोद्यत्वात् । कर्मकालदैवद्रव्यादिस्वभावानां गुणप्रधानभावस्त्वनियतो दुर्विज्ञेयश्चेति तत्कृतो मोहो लोकस्य—कर्मैव कारकं नान्यत्फलप्राप्ताविति केचित्; दैवमेवेत्यपरे; काल इत्येके; द्रव्यादिस्वभाव इति केचित्; सर्वं एते संहता एवेत्यपरे । तत्र कर्मणः प्राधान्यमङ्गीकृत्य वेदस्मृतिवादाः—"पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन" (बृ० उ० ३।२।१३) इत्यादयः । यद्यप्येषां स्वविषये कस्यचित्प्राधान्योद्भव इतरेषां तत्कालीनप्राधान्यशक्तिस्तम्भः, तथापि | उनके कारण कर्मोंमें फलप्राप्तिके प्रति अविश्वास नहीं हो सकता ।<br>इसके सिवा इन (देवादि) का विघ्न करना कर्मोंके भी अधीन है, क्योंकि कर्मोंके अपने सामर्थ्यका कहीं बाध नहीं हो सकता ।¹ कर्म, काल, दैव और द्रव्यादि स्वभावोंका गौण और मुख्य भाव अनिश्चित एवं दुर्विज्ञेय है । इसीसे उनके कारण लोगोंको मोह हो जाता है । किन्हींका मत है कि फलप्राप्तिमें कर्म ही कारक है, और कोई नहीं; कोई कहते हैं-दैव उसका हेतु है; किन्हींका कथन है कि काल इसका कारण है; कोई द्रव्यादिके स्वभावको इसका हेतु बतलाते हैं और किन्हींका मत है कि वे सब मिलकर कर्मफलप्राप्तिके हेतु हैं । इनमें कर्मकी प्रधानताको लेकर ही "पुण्यकर्मसे पुरुष पुण्यवान् होता है और पापकर्मसे पापी होता है" इत्यादि वेद और स्मृतिवाद प्रवृत्त होते हैं । यद्यपि अपने-अपने विषयमें इनमेंसे किसी-किसीकी प्रधानताका उदय होता है और उस समय अन्य कारकोंकी प्राधान्यशक्तिका निरोध |
१. अतः जबतक कोई पापमय अदृष्ट नहीं होगा, तबतक दुःखादिकों प्राप्ति नहीं हो सकती ।