बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 278, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 278
| २७२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय १ |
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| न कर्मणः फलप्राप्तिं प्रत्यनैकान्तिकत्वम्, शास्त्रन्यायनिर्धारितत्वात्कर्मप्राधान्यस्य । | हो जाता है तथापि फलप्राप्तिमें कर्मका अनैकान्तिकत्व (अप्राधान्य) नहीं है, क्योंकि शास्त्र और न्यायसे कर्मकी प्रधानता निश्चित है। |
| न; अविद्यापगममात्रत्वाद् ब्रह्मप्राप्तिफलस्य—यदुक्तं ब्रह्मप्राप्तिफलं प्रति देवा विघ्नं कुर्यु-रिति, तत्र न देवानां विघ्नकरणे सांमर्थ्यम्; कस्मात् ? विद्याकालानन्तरितत्वाद् ब्रह्मप्राप्तिफलस्य । | तथा ब्रह्मविद्याके फलमें विघ्न नहीं पड़ता, क्योंकि ब्रह्मप्राप्तिका फल तो केवल अविद्याकी निवृत्ति ही है। ऊपर जो यह कहा गया था कि विद्या (ज्ञान) के ब्रह्मप्राप्तिरूप फलमें देवगण विघ्न करेंगे सो उसमें विघ्न करनेकी देवताओंमें शक्ति नहीं है। क्यों नहीं है ? क्योंकि ब्रह्मप्राप्तिरूप फल तो ज्ञान होनेके समय ही प्राप्त हो जाता है। |
| कथम् ? यथा लोके द्रष्टुश्चक्षुष आलोकेन संयोगो यत्कालः, तत्काल एव रूपाभिव्यक्तिः । | किस प्रकार ? जिस प्रकार लोकमें देखनेवालेके नेत्रोंका प्रकाशके साथ जिस समय संयोग होता है उसी समय रूपकी अभिव्यक्ति हो जाती है। |
| एवमात्मविषयं विज्ञानं यत्कालम्, तत्काल एव तद्विषयाज्ञानतिरोभावः स्यात् । | उसी प्रकार जिस समय आत्मविषयक ज्ञान होता है उसी समय तद्विषयक अज्ञानकी निवृत्ति हो जाती है। |
| अतो ब्रह्मविद्यायां सत्यामविद्याकार्यानुपपत्तेः प्रदीप इव तमःकार्यस्य, केन कस्य | अतः जिस प्रकार दीपकके रहते हुए अन्धकारका कार्य नहीं रहता उसी प्रकार ब्रह्मविद्याके रहते हुए अविद्याका कार्य रहना असम्भव है। जब कि ब्रह्मवेत्ता देवताओंके आत्मत्वको ही |