भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 280
२७४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १
अविद्यानिवृत्तौ विद्यावृत्तेः सामर्थ्य-विवेचनम्
एवं तर्हि विद्याप्रत्ययसन्तत्याभावाद् विपरीतप्रत्ययतत्कार्ययोश्च दर्शनाद् अन्त्य एवात्मप्रत्ययोऽविद्यानिवर्तको न तु पूर्व इति ।**पूर्व०—**यदि ऐसी बात है तो बोधवृत्तिके प्रवाहका अभाव होनेके कारण तथा विपरीत वृत्ति और उसका कार्य देखा जानेसे यह निश्चय होता है कि अन्तिम आत्माकारवृत्ति ही अविद्याकी निवृत्ति करनेवाली हो सकती है, पहली नहीं।
न; प्रथमेनानैकान्तिकत्वात् ।**सिद्धान्ती—**ऐसा मत कहो, क्योंकि प्रथम आत्मप्रत्ययकी तरह अन्तिम प्रत्यय भी व्यभिचारी हो सकता है।
यदि हि प्रथम आत्मविषयः प्रत्ययोऽविद्यां न निवर्तयति, तथान्त्योऽपि, तुल्यविषयत्वात् ।यदि आत्मविषयक प्रथम प्रत्यय अविद्याकी निवृत्ति नहीं करता तो उसी तरह अन्तिम प्रत्यय भी नहीं करेगा, क्योंकि दोनोंका विषय समान ही है।
एवं तर्हि सन्ततोऽविद्यानिवर्तको न विच्छिन्न इति ।**पूर्व०—**यदि ऐसी बात है तो संतत (अविच्छिन्न) आत्मप्रत्यय ही अविद्याका निवर्तक हो सकता है, विच्छिन्न नहीं।
न, जीवनादौ सति सन्तत्यनुपपत्तेः ।**सिद्धान्ती—**ऐसी बात नहीं है, क्योंकि जीवनादिके रहते हुए आत्माकारवृत्तिकी सन्तति (अविच्छिन्नता) सम्भव नहीं है।
न हि जीवनादिहेतुके प्रत्यये सति विद्याप्रत्ययसन्ततिरूपपद्यते, विरोधात् ।जीवनादिकी हेतुभूता वृत्तिके रहते हुए बोधवृत्तिकी अविच्छिन्नता सम्भव नहीं है, क्योंकि उनमें विरोध है।
अथ जीवनादिप्रत्ययतिरस्करणेनैव आ मरणा-यदि कहो, जीवनादिकी हेतुभूता वृत्तियोंका तिरस्कार करके ही मरण-