बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 284, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| २७८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| तिप्सु तन्निरुणद्धि, अनागतत्वात् । अतीतं हीतरत् ।<br><br>किञ्च, न च विपरीतप्रत्ययो विद्यावत उत्पद्यते, निर्विषयत्वात् । अनवधृतविषयविशेषस्यरूपं हि सामान्यमात्रमाश्रित्य विपरीतप्रत्यय उत्पद्यमान उत्पद्यते, यथा शुक्तिकायां रजतमिति । स च विषयविशेषावधारणवतोऽशेषविपरीतप्रत्ययाश्रयस्योपमर्दितत्वान्न पूर्ववत्सम्भवति, शुक्तिकादौ सम्यक्प्रत्ययोत्पत्तौ पुनरदर्शनात् ।<br><br>क्वचित्तु विद्यायाः पूर्वोत्पन्नविपरीतप्रत्ययजनितसंस्कारेभ्यो विपरीतप्रत्ययावभासाः स्मृतयो जायमाना विपरीतप्रत्ययभ्रान्तिमकस्मात्कुर्वन्ति; यथा विज्ञातदिग्विभागस्याप्यकस्माद्दिग्विपर्ययविभ्रमः । सम्यग्ज्ञानवतोऽपि चेत्पूर्ववद्विपरीतप्रत्यय उत्पद्यते, | उत्पन्न होनेवाला होता है, उसे ही वह रोकता है; क्योंकि वह अनागत है और प्रारब्ध तो अतीत है ।<br><br>इसके सिवा, विद्वान्को विपरीत प्रत्यय उत्पन्न हो भी नहीं सकता, क्योंकि उसके लिये कोई विषय नहीं रहता । विषयके विशेष स्वरूपका निश्चय न होनेपर उसके सामान्य स्वरूपको आश्रित करके उत्पन्न होनेवाला ही विपरीत प्रत्यय उत्पन्न होता है; जैसे शुक्तिमें रजत । किंतु जिसे विषयके विशेष रूपका निश्चय हो गया है, उसकी दृष्टिमें सब प्रकारके विपरीत प्रत्ययके आश्रयका बाध हो जानेके कारण उसका पूर्ववत् उत्पन्न होना सम्भव नहीं है; जैसे कि शुक्तिकादिमें, उनका सम्यग्ज्ञान हो जानेपर फिर रजतादिका भ्रम होता नहीं देखा जाता ।<br><br>परंतु कभी-कभी ज्ञानोदयसे पूर्व उत्पन्न हुए विपरीत प्रत्ययजनित संस्कारोंसे विपरीत प्रत्ययके समान भासनेवाली स्मृतियाँ उत्पन्न होकर अकस्मात् विपरीत प्रत्ययकी भ्रान्ति पैदा कर देती हैं, जिस प्रकार दिशाओंके विभागको अच्छी तरह जाननेवाले पुरुषको भी अकस्मात् दिग्भ्रम पैदा हो जाता है । यदि सम्यग्ज्ञानवान्को भी पूर्ववत् विपरीत |