भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 296, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 296
२९०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| स्वहिंसया सुतराम् । यथा लोके श्रेयांसं प्रशस्ततरं हिंसित्वा परिभूय पापतरो भवति तद्वत् ॥११॥ | हिंसा करनेसे और भी अधिक पापी होता है। जिस प्रकार लोकमें श्रेष्ठ अर्थात् अधिक प्रशंसनीयकी हिंसा—पराभव करके पुरुष बड़ा पापी होता है उसी प्रकार उसे भी बड़ा भारी पाप लगता है ॥ ११ ॥ |

वैश्यजातिकी उत्पत्ति

क्षत्रे सृष्टेऽपि—क्षत्रियोंकी रचना हो जानेपर भी—

स नैव व्यभवत्स विशमसृजत यान्येतानि देवजातानि गणश आख्यायन्ते वसवो रुद्रा आदित्या विश्वेदेवा मरुत इति ॥ १२ ॥

वह (ब्रह्म) विभूतियुक्त कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने वैश्यजातिकी रचना की। जो ये वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुत् इत्यादि देवगण गणशः कहे जाते हैं [उन्हें उत्पन्न किया] ॥ १२ ॥

स नैव व्यभवत्, कर्मणे ब्रह्म तथा न व्यभवत्, वित्तोपार्जयितुरभावात् । स विशमसृजत कर्मसाधनवित्तोपार्जनाय । कः पुनरसौ विट्? यान्येतानि देवजातानि—स्वार्थे निष्ठा, य एते देवजातिभेदा इत्यर्थः; गणशो गणं गणम्, आख्यायन्ते कथ्यन्ते । गणप्राया हि विशः, प्रायेणवह (ब्रह्म) धनोपार्जन करनेवालेका अभाव होनेके कारण कर्म करनेमें समर्थ नहीं हुआ। उसने कर्मके साधनभूत धनका उपार्जन करनेके लिये वैश्यजातिको रचा। वे वैश्यलोग कौन थे ? ये जो देवजात हैं। 'देवजातानि' इस पदके 'जात' शब्दमें जो 'त' यह निष्ठाप्रत्यय है वह स्वार्थमें है। तात्पर्य यह है कि ये जो देवजातिके भेद हैं, जो गणशः अर्थात् एक-एक गण करके कहे जाते हैं; क्योंकि वैश्यलोग गणप्राय होते हैं, वे प्रायः अनेक