भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 358, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 358
३५२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

आत्मार्थ अन्नोंका आधिदैविक विस्तार

व्याख्यातो वाङ्मनःप्राणानामा-<br>धिभौतिको विस्तारः। अथायमा-<br>धिदैविकार्थ आरम्भः—[इस प्रकार] वाक्, मन और प्राणके आधिभौतिक विस्तारकी व्याख्या तो कर दी गयी, अब यहाँसे आधिदैविक विषय आरम्भ किया जाता है—

तस्यै वाचः पृथिवी शरीरं ज्योतीरूपमयमग्निस्त-<br>द्यावत्येव वाक्तावती पृथिवी तावानयमग्निः ॥ ११ ॥

उस वाक्‌का पृथिवी शरीर है और यह अग्नि ज्योतीरूप है। तहाँ जितनी वाक्‌ है, उतनी ही पृथिवी है और उतना ही यह अग्नि है ॥ ११ ॥

तस्यै तस्याः वाचः प्रजापते-<br>रन्नत्वेन प्रस्तुतायाः पृथिवी शरीरं<br>बाह्य आधारः, ज्योतीरूपं प्रकाशा-<br>त्मकं करणं पृथिव्या आधेयभूत-<br>मयं पार्थिवोऽग्निः। द्विरूपा हि<br>प्रजापतेर्वाक्-कार्यमाधारोऽप्रकाशः<br>करणं चाधेयं प्रकाशः, तदुभयं<br>पृथिव्यग्नी वागेव प्रजापतेः।<br>तत्तत्र यावत्येव यावत्परिमा-<br>णैव अध्यात्माधिभूतभेदभिन्ना<br>सती वाग्भवति, तत्र सर्वत्र<br>आधारत्वेन पृथिवी व्यवस्थिता,<br>तावत्येव भवति कार्यभूता;प्रजापतिके अन्नरूपसे प्रस्तुत हुए उस वाक्‌का पृथिवी शरीर यानी बाह्य आधार है तथा पृथिवी-का आधेयभूत यह पार्थिव अग्नि उसका ज्योतीरूप यानी प्रकाशा-त्मक करण है। प्रजापतिकी वाक्‌ दो प्रकारकी है—(१) कार्य, आधार और अप्रकाशरूप तथा (२) करण, आधेय और प्रकाशरूप; वे दोनों पृथिवी और अग्नि प्रजापतिकी वाक्‌ ही हैं।<br>उनमें जितनी अर्थात् जितने परिमाणवाली अध्यात्म और अधिभूत भेदोंसे भिन्न होनेवाली वाक्‌ है, उसमें सर्वत्र उसके आधाररूपसे व्यवस्थित कार्यभूता पृथिवी भी उतनी ही है;