बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 359, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३५३
| तावानयमग्निः, आधेयः करणरूपो ज्योतीरूपेण पृथिवीमनुप्रविष्टस्तावतानेव भवति । समानमुत्तरम् ॥ ११ ॥ | तथा उतना ही अग्नि है, अर्थात् ज्योतीरूपसे पृथिवीमें अनुप्रविष्ट आधेय और करणरूप अग्नि भी उतना ही है। आगेके पर्यायोंमें भी ऐसा ही समझना चाहिये ॥ ११ ॥ |
इन्द्ररूप प्राणकी उत्पत्ति और उसकी उपासनाका फल
अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यस्तद्यावदेव मनस्तावती द्यौस्तावानसावादित्यस्तौ मिथुन ँ समैतां ततः प्राणोऽजायत स इन्द्रः स एषोऽसपत्नो द्वितीयो वै सपत्नो नास्य सपत्नो भवति य एवं वेद ॥ १२ ॥
तथा इस मनका द्युलोक शरीर है, ज्योतीरूप वह आदित्य है; वहाँ जितना मन है, उतना ही द्युलोक और उतना ही वह आदित्य है। वे (आदित्य और अग्नि) मिथुन (पारस्परिक संसर्ग) को प्राप्त हुए। तब प्राण उत्पन्न हुआ। वह इन्द्र है और वह असपत्न—शत्रुहीन है; दूसरा [अर्थात् प्रतिपक्षी] ही सपत्न होता है। जो ऐसा जानता है, उसका सपत्न नहीं होता ॥ १२ ॥
| अथैतस्य प्राजापत्यान्नोक्तस्यैव मनसो द्यौर्द्युलोकः शरीरं कार्यमाधारः, ज्योतीरूपं करणं योऽसावादित्यः । तत्तत्र यावत्परिमाणमेव अध्यात्ममधिभूतं वा मनस्तावती तावद्विस्तारा तावत्परिमाणा मनसो ज्योतीरूपस्य | तथा प्राजापत्य अन्नरूपसे कहे हुए इस मनका द्यौः—द्यु लोक शरीर—कार्य अर्थात् आधार है और वह आदित्य ज्योतीरूप—करण यानी आधेय है। उनमें जितना परिमाणवाला अध्यात्म और अधिभूत मन है उतना—उतने विस्तारवाला अर्थात् उतने ही परिमाणवाला मनके ज्योती- |
बृ० उ० २३—