बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 377, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७१
| यस्मादेवं सम्पन्नः पुत्रः पितरम् अस्माल्लोकात्कर्तव्यताबन्धनतो मोचयिष्यति, तस्मात्पुत्रमनुशिष्टं लोक्यं लोकहितं पितुराहुर्ब्राह्मणाः । अत एव ह्येनं पुत्रमनुशासति, लोक्योऽयं नः स्यादिति, पितरः । <br><br> स पिता यदा यस्मिन्काले एवंवित्पुत्रसमर्पितकर्तव्यताक्रतुः, अस्माल्लोकात्प्रैति म्रियते, अथ तदैभिरेव प्रकृतैर्वाङ्मनःप्राणैः पुत्रमाविशति पुत्रं व्याप्नोति । अध्यात्मपरिच्छेदहेत्वपगमात् पितुर्वाङ्मनःप्राणाःस्वेन आधिदैविकेन रूपेण पृथिव्यग्न्याद्यात्मना भिन्नघटप्रदीपप्रकाशवत्सर्वमाविशन्ति । | क्योंकि इस प्रकार सम्पन्न (कर्तव्यभारसे युक्त) हुआ पुत्र पिताको इस लोकसे कर्तव्यताके बन्धनसे मुक्त करा देगा, इसलिये ब्राह्मणगण इस प्रकार अनुशिष्ट—सुशिक्षित किये गये पुत्रको लोक्य--पिताके लिये लोकमें हितकर बतलाते हैं। इसीलिये इस आशयसे कि 'यह हमारे लिये लोक्य हो' पितृगण इस पुत्रका अनुशासन करते हैं। <br><br> इस प्रकार जाननेवाले पुत्रको जिसने अपनी कर्तव्यताका संकल्प सौंप दिया है वह पिता जिस समय इस लोकसे जाता है यानी मरता है तब वह इन प्रकृत वाक्, मन और प्राणोंसे ही पुत्रमें आविष्ट अर्थात् व्याप्त हो जाता है। अध्यात्मपरिच्छेदरूप हेतुकी निवृत्ति हो जानेके कारण पिताके वाक्, मन और प्राण अपने पृथिवी एवं अग्नि आदि आधिदैविक रूपसे फूटे हुए घड़ेके अन्तर्वर्ती दीपकके प्रकाशके समान सबमें व्याप्त |
ही नहीं होता, विकरण, सुप्, तिङ्, पद, लिङ्ग और पुरुष आदिका भी होता है, जैसा कि निम्नाङ्कित कारिकासे सिद्ध होता है—'सुप्तिङुपग्रहलिङ्गनराणां कालहलच्स्वरकर्तृयङां च। व्यत्ययमिच्छति शास्त्रकृदेषां सोऽपि च सिद्ध्यति बाहुलकेन ।।' उपर्युक्त 'अभुनजत्' क्रियामें विकरणका भी व्यत्यय हुआ है, अन्यथा 'अभुनक्' रूप ही होना उचित है। यहाँ 'श्नम्' और 'शप्' दो विकरणोंके होनेसे 'अभुनजत्' रूप बना है।