भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 378, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 378
३७२बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| तैः प्राणैः सह पिताप्याविशति, वाङ्मनःप्राणात्मभावित्वात्पितुः। अहमस्म्यनन्ता वाङ्मनःप्राणा अध्यात्मादिभेदविस्तारा इत्येवंभावितो हि पिता। तस्मात्तत्प्राणानुवृत्तित्वं पितुर्भवतीति युक्तमुक्तम्—एभिरेव प्राणैः सह पुत्रमाविशतीति; सर्वेषां ह्यसावात्मा भवति पुत्रस्य च। | हो जाते हैं। उन प्राणोंके साथ पिता भी सबमें व्याप्त हो जाता है, क्योंकि वह तो वाक्, मन और प्राणका स्वरूपभूत ही है। पिताकी ऐसी भावना रही है कि 'मैं ही अध्यात्मादि भेद-विस्तारवाले अनन्त वाक्, मन और प्राण हूँ।' अतः पिताकी उन प्राणोंमें अनुवृत्ति होती है, इसलिये यह ठीक ही कहा है कि 'इन प्राणोंके साथ ही वह पुत्रमें व्याप्त होता है', क्योंकि वह सभीका और पुत्रका, भी आत्मा हो जाता है। | | एतदुक्तं भवति—यस्य पितुरेवमनुशिष्टः पुत्रो भवति सोऽस्मिन्नेव लोके वर्तते पुत्ररूपेण, नैव मृतो मन्तव्य इत्यर्थः। तथा च श्रुत्यन्तरे—"सोऽस्यायमितर आत्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयते" (ऐ० उ० ४ । ४) इति। | इससे यह प्रतिपादित होता है कि जिस पिताका इस प्रकार अनुशासन किया हुआ पुत्र होता है, वह पुत्ररूपसे इसी लोकमें विद्यमान रहता है, अर्थात् उसे मरा हुआ नहीं मानना चाहिये। ऐसा ही इस अन्य श्रुतिमें भी कहा है—"उसका यह दूसरा आत्मा पुण्य-कर्मोंके लिये प्रतिनिधि बना दिया जाता है" इत्यादि। | | अथेदानीं पुत्रनिर्वचनमाह—<br>स पुत्रो यदि कदाचिदनेन पित्रा अक्ष्णया कोणच्छिद्रतोऽन्तरा अकृतं भवति कर्तव्यम्, तस्मात्, | अब श्रुति पुत्रका निर्वचन (व्युत्पत्ति) बतलाती है—वह पुत्र, यदि कभी उसके इस पिताद्वारा 'अक्ष्णा'—'कोणच्छिद्र' (असावधानी) से बीचमें कोई कर्तव्य बिना किये |


१. ऐतरेय उपनिषद्में इस मन्त्रका पाठ इस प्रकार है—सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्यः कर्मभ्यः प्रतिधीयतेऽथास्यायमितर आत्मा...।