बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 40, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३४ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
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| कर्मज्ञानकाण्डयोः प्रयोजनम्<br><br>तथानुमानादपि¹ । श्रुत्यात्मास्तित्वे लिङ्गस्य दर्शितत्वाल्लिङ्गस्य च प्रत्यक्षविषयत्वान्नेति चेन्न, जन्मान्तरसम्बन्धस्याग्रहणात् । आगमेन त्वात्मास्तित्वेऽवगते वेदप्रदर्शितलौकिकलिङ्गविशेषैश्च तदनुसारिणो मीमांसकास्तार्किकाश्च अहम्प्रत्ययलिङ्गानि च वैदिकान्येव स्वमतिप्रभवाणीति कल्पयन्तो वदन्ति प्रत्यक्षश्चानुमेयश्चात्मेति ।<br><br>सर्वथाप्यस्त्यात्मा देहान्तरसम्बन्धीत्येवं प्रतिपत्तुर्देहान्तरगतेष्टा- | इसी प्रकार अनुमानसे भी [ आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता ]¹ । यदि कहो कि श्रुतिने आत्माके अस्तित्वमें लिङ्ग² ( बीज ) दिखलाया है और लिङ्ग प्रत्यक्षप्रमाणका विषय होता है, इसलिये आत्मा [ प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाणका भी विषय है ] केवल आगमका ही विषय नहीं है—तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जन्मान्तरके सम्बन्धका किसी अन्य प्रमाणसे ग्रहण नहीं होता । आगमप्रमाणसे तथा वेदोक्त लौकिक लिङ्गविशेषोंके द्वारा आत्माका अस्तित्व जान लेनेपर ही उसीका अनुसरण करनेवाले मीमांसक और नैयायिक वैदिक अहंंप्रतीति और वैदिक लिङ्गोंको ही ‘ये हमारी बुद्धिसे निकले हुए तर्क हैं’ ऐसी कल्पना करते हुए कहते हैं कि ‘आत्मा प्रत्यक्ष और अनुमानका भी विषय है’ ।<br><br>सब प्रकार देहान्तरसे सम्बन्ध रखनेवाला आत्मा है—ऐसा जाननेवाले तथा देहान्तरगत इष्टप्राप्ति और |
१. अनुमानका स्वरूप यों है—इच्छा आदि किसीके आश्रित होते हैं; क्योंकि वे गुण हैं, जैसे रूप आदि । इस प्रकारके अनुमानद्वारा इच्छादिके आश्रयरूपसे भी आत्माका अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि इच्छादिका अधिष्ठान मन ही प्रसिद्ध है, मनसे अतिरिक्त इच्छादिकी उपलब्धि नहीं होती ।
२. 'यः प्राणेन प्राणिति' इत्यादि श्रुतिके अनुसार प्राणनादि व्यापार ही आत्माके अस्तित्वमें लिङ्ग है ।