बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
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ब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३५
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| निष्टप्राप्तिपरिहारोपायविशेषार्थिनस्तद्विशेषज्ञापनाय कर्मकाण्डमारब्धम् । न त्वात्मन इष्टानिष्टप्राप्तिपरिहारेच्छाकारणमात्मविषयमज्ञानं कर्तृभोक्तृस्वरूपाभिमानलक्षणं तद्विपरीतब्रह्मात्मस्वरूपविज्ञानेनापनीतम् । यावद्धि तन्नापनीयते तावदयं कर्मफलरागद्वेषादिस्वाभाविकदोषप्रयुक्तः शास्त्रविहितप्रतिषिद्धातिक्रमेणापि वर्तमानो मनोवाक्कायैर्दृष्टादृष्टानिष्टसाधनानि अधर्मसंज्ञकानि कर्माण्युपचिनोति बाहुल्येन, स्वाभाविकदोषबलीयस्त्वात् । ततः स्थावरान्ताधोगतिः । कदाचिच्छास्त्रकृतसंस्कारबलीयस्त्वम्, ततो मनआदिभिरिष्टसाधनं बाहुल्येनोपचिनोति धर्माख्यम् । तद्द्विविधम्-ज्ञानपूर्वकं केवलञ्च । तत्र केवलं पितृलोकादिप्राप्तिफलम् । ज्ञानपूर्वकं देवलोकादि- | अनिष्टनिवृत्तिके उपायविशेषको जाननेकी इच्छावाले पुरुषोंको उस विशेष उपायका ज्ञान करानेके लिये कर्मकाण्ड आरम्भ किया गया है। उसमें आत्माकी इष्टप्राप्ति एवं अनिष्टनिवृत्तिकी इच्छाके कारण कर्तृत्वभोक्तृत्वाभिमानरूप आत्मविषयक अज्ञानको उससे विपरीत ब्रह्मात्मस्वरूप ज्ञानके द्वारा दूर नहीं किया गया। जबतक उस (अज्ञान) की निवृत्ति नहीं होती, तबतक यह जीव कर्मफलके राग-द्वेषादिरूप स्वाभाविक दोषोंसे प्रेरित होनेके कारण शास्त्रकथित विधि और निषेधका उल्लङ्घन करके भी बर्तता हुआ मन, वाणी और शरीरसे दृष्ट और अदृष्ट अनिष्टके साधनभूत अधर्मसंज्ञक कर्मोंको अधिकतासे करता रहता है, क्योंकि स्वभावजनित दोष बहुत प्रबल होता है। इससे उसे स्थावरपर्यन्त अधोगति प्राप्त होती है। कभी शास्त्रोक्त संस्कारोंकी प्रबलता होती है, उस समय यह मन आदिसे अधिकतर धर्मसंज्ञक इष्टसाधनोंका सम्पादन करता है। वे ज्ञान (उपासना) पूर्वक और केवल भेदसे दो प्रकारके हैं। उनमें केवल धर्म पितृलोकादिकी प्राप्तिरूप फलवाले हैं और ज्ञानपूर्वक धर्म देवलोकसे |