बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 42, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय १ |
|---|
| ब्रह्मलोकान्तप्राप्तिफलम् । तथा च शास्त्रम्—“आत्मयाजी श्रेयान्देवयाजिनः” (शत० ब्राह्म०) इत्यादि । स्मृतिश्च “द्विविधं कर्म वैदिकम्” (मनु० १२।८८) इत्याद्या । साम्ये च धर्माधर्मयोः मनुष्यत्वप्राप्तिः। एवं ब्रह्माद्या स्थावरान्ता स्वाभाविकाविद्यादिदोषवती धर्माधर्मसाधनकृता संसारगतिर्नामरूपकर्माश्रया । तदेवेदं व्याकृतं साध्यसाधनरूपं जगत्प्रागुत्पत्तेरव्याकृतमासीत् । स एष बीजाङ्कुरादिवदविद्याकृतः संसार आत्मनि क्रियाकारकफलाध्यारोपलक्षणोऽनादिरनन्तोऽनर्थः, इत्येतस्माद्विरक्तस्याविद्यानिवृत्तये तद्विपरीतब्रह्मविद्याप्रतिपत्तयेऽथोपनिषदारभ्यते । <br><br> अस्य त्वश्वमेधकर्मसम्बन्धिनो <br> (अश्वमेधब्राह्मण-प्रयोजनम्) विज्ञानस्य प्रयोजनं येषामश्वमेधे न | लेकर ब्रह्मलोकतककी प्राप्तिरूप फलवाले हैं। ऐसा ही शास्त्र भी कहता है—“देवोपासककी अपेक्षा आत्मोपासक श्रेष्ठ है।¹” तथा “वैदिक कर्म दो प्रकारका है” (प्रवृत्ति-प्रधान और निवृत्तिप्रधान) ऐसी स्मृति भी है। धर्म और अधर्मकी समान मात्रा होनेपर मनुष्यत्वकी प्राप्ति होती है। इस प्रकार धर्म एवं अधर्मरूप साधनसे होनेवाली ब्रह्मासे लेकर स्थावरपर्यन्त नाम, रूप एवं कर्मके आश्रित स्वाभाविक अविद्यादि दोषवाली सांसारिक गति है। वह यह साध्यसाधनरूप व्याकृत जगत् उत्पत्तिसे पूर्व अव्याकृत था। आत्मामें क्रिया, कारक एवं फलका आरोपरूप यह अविद्याकृत संसार बीजाङ्कुरादिके समान [प्रवाहरूपसे] अनादि और अनन्त अनर्थरूप है; अतः इससे विरक्त हुए पुरुषकी अविद्याकी निवृत्तिके लिये इससे विपरीत ब्रह्मविद्याकी प्राप्तिरूप प्रयोजनवाली यह उपनिषद् आरम्भ की जाती है। <br><br> [इस उपनिषद्के आरम्भमें कहे हुए] इस अश्वमेधकर्मसम्बन्धी विज्ञानका तो यही प्रयोजन है कि |
१. सर्वत्र परमात्मबुद्धि रखकर नित्य कर्मोंका अनुष्ठान करनेवाला पुरुष आत्मयाजी (आत्मोपासक) है और कामनापूर्वक देवताओंकी उपासना करनेवाला देवयाजी (देवोपासक) है।