बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १] शाङ्करभाष्यार्थ ३७
| अधिकारस्तेषामस्मादेव विज्ञानात् फलप्राप्तिः। 'विद्यया वा कर्मणा वा' "तद्धैतल्लोकजिदेव" (बृ० उ० १।३।२८) इत्येवमादिश्रुतिभ्यः। | जिनका [असामर्थ्यवश] अश्वमेध यज्ञमें अधिकार नहीं है उन्हें इस विज्ञानसे ही उसके फलकी प्राप्ति हो जाय; जैसा कि “ज्ञान (उपासना) से अथवा कर्मसे [उसके फलकी प्राप्ति होती है]” “वह यह (प्राणदर्शन) लोक-प्राप्तिका साधन है” इत्यादि श्रुतियोंसे सिद्ध होता है। | | कर्मविषयत्वमेव विज्ञानस्येति चेन्न, "योऽश्वमेधेन यजते य उ चैनमेवं वेद" इति विकल्पश्रुतेः। | यदि कहो कि अश्वमेधविज्ञान अश्वमेधकर्मसे ही सम्बन्ध रखता है तो यह ठीक नहीं है; क्योंकि “जो अश्वमेधसे यजन करता है अथवा जो इसे इस प्रकार जानता है [वह सब पापोंको पार कर जाता है]” | | विद्याप्रकरणे चाम्नानात् कर्मान्तरे च सम्पादनदर्शनाद् विज्ञानात् तत्फलप्राप्तिरस्तीत्यवगम्यते। | इस प्रकार कर्मके ज्ञान और अनुष्ठानका विकल्प बतलानेवाली श्रुति है। इसके सिवा इसका उल्लेख उपासनाप्रकरणमें होनेसे तथा अश्वमेधसे भिन्न [चित्याग्नि] कर्ममें¹ इसका सम्पादन देखा जानेसे भी यह ज्ञात होता है कि अश्वमेध-विज्ञानसे भी अश्वमेधका ही फल मिलता है। | | सर्वेषां च कर्मणां परं कर्माश्वमेधः समष्टिव्यष्टिप्तिफलत्वात्। तस्य चेह ब्रह्मविद्याप्रारम्भ आम्नानं सर्वकर्मणां संसारविषयत्वप्रदर्श- | समष्टि और व्यष्टि हिरण्यगर्भकी प्राप्तिरूप फलवाला होनेसे समस्त कर्मोंमें अश्वमेध कर्म उत्कृष्ट है। यहाँ ब्रह्मविद्याके आरम्भमें उसका उल्लेख समस्त कर्मोंका |
¹ 'अयं वै लोकोऽग्निः' (बृ० उ० ६।२।११) इत्यादि वाक्यद्वारा।