भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 400, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 400
३९४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय १

| “यः कश्च शब्दो वागेव सा” (१।५।३) इत्युक्तत्वाद्वागित्थे1तस्य शब्दस्य योऽर्थः शब्दसामान्यमात्रम् एतदेतेषां नामविशेषाणामुक्थं कारणमुपादानम्, सैन्धवलवणकणानामिव सैन्धवाचलः। | है। क्योंकि ऐसा कहा गया है कि “जो कुछ शब्द है वह वाक् ही है” इसलिये वाक् इस शब्दका जो अर्थ है वह शब्दसामान्यमात्र इन नाम-विशेषोंका उक्थ कारण अर्थात् उपादान है, जिस प्रकार सैन्धवगिरि सैन्धवलवणके कणोंका। | | तदाह—अतो ह्यस्मान्नामसामान्यात्सर्वाणि नामानि यज्ञदत्तो देवदत्त इत्येवमादिप्रविभागान्युत्तिष्ठन्त्युत्पद्यन्ते प्रविभज्यन्ते, लवणाचलादिव लवणकणाः; कार्यं च कारणेनाव्यतिरिक्तम्। तथा विशेषाणां च सामान्येऽन्तर्भावात्। | यही बात श्रुति कहती है—क्योंकि इस नामसामान्यसे ही लवणाचलसे लवणके कणोंके समान समस्त नाम—यज्ञदत्त, देवदत्त इत्यादि नामविभाग उत्पन्न अर्थात् विभक्त होते हैं और कार्य कारणसे अभिन्न होता है तथा विशेष भी सामान्यके अन्तर्गत रहते हैं। | | कथं सामान्यविशेषभाव इति— | किंतु नाम और वाक्का सामान्यविशेषभाव किस प्रकार है? | | एतच्छब्दसामान्यमेषां नामविशेषाणां साम। समत्वात्साम, सामान्यमित्यर्थः; एतद्धि यस्मात्सर्वैर्नामभिरात्मविशेषैः समम्। | [सो बतलाते हैं—] यह शब्दसामान्य ही इन नामविशेषोंका साम है। यह सम होनेके कारण साम अर्थात् सामान्य है; क्योंकि यही अपने विशेषभूत सम्पूर्ण नामोंसे सम है। तथा | | किञ्च आत्मलाभाविशेषाच्च नामविशेषाणाम्। यस्य च यस्मा- | जितने नामविशेष हैं, उन्हें नामसामान्यसे ही स्वरूपकी प्राप्ति होती है, अतः उनसे अविशेष (अभिन्न) होनेके कारण [ उनका नामसामान्यमें ही अन्तर्भाव होता है ]। जिससे |

Footnotes

  1. मूल पुस्तक में ‘द्वागित्येतस्य’ पाठ मुद्रित है।