बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 401, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ब्राह्मण ६ ] | शाङ्करभाष्यार्थे | ३९५ |
|---|
| दात्मलाभो भवति स तेनाप्रवि- <br><br> भक्तो दृष्टः, यथा घटादीनां मृदा। <br><br> कथं नामविशेषाणामात्मलाभो <br><br> वाच इत्युच्यते—यत एतदेषां <br><br> वाक्छब्दवाच्यं वस्तु ब्रह्म आत्मा, <br><br> ततो ह्यात्मलाभो नाम्नाम्, शब्द- <br><br> व्यतिरिक्तस्वरूपानुपपत्तेः। तत्प्र- <br><br> तिपादयति—यतश्छब्दसामान्यं <br><br> हि यस्माच्छब्दविशेषान्सर्वाणि <br><br> नामानि बिभर्ति धारयति स्वरूप- <br><br> प्रदानेन। एवं कार्यकारणत्वोप- <br><br> पत्तेः सामान्यविशेषोपपत्तेरात्म- <br><br> प्रदानोपपत्तेश्च नामविशेषाणां <br><br> शब्दमात्रता सिद्धा। एवमुत्तर- <br><br> योरपि सर्वं योज्यं यथोक्तम्॥१॥ | जिसको अपने स्वरूपकी प्राप्ति होती है उससे वह अभिन्न ही देखा गया है, जैसे मृत्तिकासे घटादिका अभेद है। <br><br> नामविशेषोंको वाक् अर्थात् नामसामान्यसे अपने स्वरूपकी प्राप्ति किस प्रकार होती है ? सो बतलाया जाता है—क्योंकि वह 'वाक्' शब्दवाच्य वस्तु इन (नामविशेषों) का ब्रह्म—आत्मा है; कारण कि उसीसे नामोंको अपना स्वरूप प्राप्त होता है, क्योंकि शब्दसे भिन्न उनका कोई स्वरूप होना सम्भव हो नहीं है। इसीका श्रुति प्रतिपादन करती है—क्योंकि यह शब्दसामान्य ही शब्दविशेषरूप सम्पूर्ण नामोंको, उनका स्वरूप प्रदान करके, धारण करती है। इस प्रकार कार्य-कारणत्व सामान्य-विशेषत्व और आत्मप्रदानत्वकी उपपत्ति होनेसे नामविशेषोंकी शब्दमात्रता सिद्ध होती है। इसी प्रकार आगे कहे जानेवाले दो पर्यायोंमें भी उपर्युक्त सारी योजना लगा देनी चाहिये ॥ १ ॥ |
रूपसामान्य चक्षुका वर्णन
अथ रूपाणां चक्षुरित्येतदेषामुक्थमतो हि सर्वाणि रूपाण्युत्तिष्ठन्त्येतदेषा ँ सामैतद्धि सर्वै रूपैः सममेतदेषां ब्रह्मैतद्धि सर्वाणि रूपाणि बिभर्ति ॥ २ ॥