बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 407, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ४०१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| वमादिभिः प्रविभक्तौ विद्या-विद्याविषयौ सर्वोपनिषत्सु। तत्र चाविद्याविषयः सर्व एव साध्यसाधनादिभेदविशेषविनियोगेन व्याख्यातः—आ तृतीयाध्यायपरिसमाप्तेः। | होता है" इस प्रकारके वाक्योंसे समस्त उपनिषदोंमें ज्ञान और अज्ञान-के विषयोंको पृथक्-पृथक् कर दिया गया है। उनमें साध्य-साधनादि भेदविशेषके विनियोगद्वारा अविद्याके सभी विषयकी तृतीय अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त व्याख्या कर दी गयी है। |
| स च व्याख्यातोऽविद्याविषयः सर्व एव द्विप्रकारः—अन्तः प्राण उपष्टम्भको गृहस्येव स्तम्भादिलक्षणः प्रकाशकोऽमृतः, बाह्यश्च कार्यलक्षणोऽप्रकाशक उपजनापायधर्मकस्तृणकुशमृत्तिकासमो गृहस्येव सत्यशब्दवाच्यो मर्त्यः तेनामृतशब्दवाच्यः प्राणश्छन्न इति चोपसंहृतम्। स एव च प्राणो बाह्याधारभेदेष्वनेकधा विस्तृतः; प्राण एको देव इत्युच्यते। तस्यैव बाह्यः पिण्ड एकः साधा- | वह व्याख्या किया हुआ अविद्याका सारा ही विषय दो प्रकारका है—पहला इस शरीरके भीतर प्राण है जो गृहको धारण करनेवाले स्तम्भादिके समान शरीरका आधारभूत, प्रकाशक और अमृत है; तथा दूसरा है बाह्य कार्यरूप प्रपञ्च, जो अप्रकाशक, वृद्धि-क्षयशील, गृहके तृण, कुश और मृत्तिकाके समान मरणधर्मा और 'सत्य' शब्दका वाच्य है। उससे 'अमृत' शब्दवाच्य प्राण आच्छादित है—ऐसा ऊपर उपसंहार किया गया है। वही प्राण बाह्य आधार-भेदोंमें अनेक प्रकारसे फैला हुआ है और 'प्राण एक देव है' ऐसा कहा जाता है। उसीका एक बाह्य |
१. ब्राह्मणका तृतीय अध्याय उपनिषद्का प्रथम अध्याय है।
बृ० उ० २६—