बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| रणः—विराड् वैश्वानर आत्मा पुरुषविधः प्रजापतिः को हिरण्यगर्भः—इत्यादिभिः पिण्डप्रधानैः शब्दैराख्यायते सूर्यादिप्रविभक्तकरणः। | साधारण (समष्टि) पिण्ड, जिसके सूर्यादि विभिन्न करण हैं, विराट्, वैश्वानर, आत्मा, पुरुषविध, प्रजापति, क और हिरण्यगर्भ आदि शरीरप्रधान शब्दोंसे पुकारा जाता है। | | एकं चानेकं च ब्रह्म एतावदेव, नातः परमस्ति, प्रत्येकं च शरीरभेदेषु परिसमाप्तं चेतनावत्कर्तृ भोक्तृ च—इत्यविद्याविषयमेव आत्मत्वेनोपगतो गार्ग्यो ब्राह्मणो वक्ता उपस्थाप्यते; तद्विपरीतात्मदृगजातशत्रुः श्रोता; एवं हि यतः पूर्वपक्षसिद्धान्ताख्यायिकारूपेण समर्प्यमाणोऽर्थः श्रोतुश्चित्तस्य वशमेति; विपर्यये हि तर्कशास्त्रवत् केवलार्थानुगमवाक्यैः समर्प्यमाणो दुर्विज्ञेयः स्यादत्यन्तसूक्ष्मत्वाद्वस्तुनः। तथा च काठके—<br><br>“श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः”<br><br>(क० उ० १ । २ । ७) इत्यादिवाक्यैः सुसंस्कृतदेवबुद्धिगम्य- | एक और अनेक ब्रह्म—बस इतना ही है, इसके सिवा और कुछ नहीं है, वह प्रत्येक शरीरभेदोंमें समाप्त होनेवाला (परिच्छिन्न) है, चेतनावान् है तथा कर्ता और भोक्ता है—इस प्रकार अविद्याके विषयको ही आत्मस्वरूपसे समझनेवाला गार्ग्य ब्राह्मण यहाँ वक्तारूपसे उपस्थित किया जाता है; तथा इससे विपरीत जाननेवाला आत्मदर्शी अजातशत्रु श्रोता है; क्योंकि इस प्रकार पूर्वपक्ष और सिद्धान्तकी आख्यायिकारूपसे समर्पित किया जानेवाला विषय श्रोताके चित्तके अधीन हो जाता है और इसके विपरीत तर्कशास्त्रके समान केवल वस्तुका बोध करानेवाले वाक्योंसे समर्पित किया जानेवाला विषय दुर्विज्ञेय होता है; क्योंकि आत्मतत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म है। इसी प्रकार कठोपनिषद्में भी “जो बहुतोंको सुननेके लिये भी नहीं मिलता” इत्यादि वाक्योंसे आत्मतत्त्व सुसंस्कृत देवबुद्धि (सात्त्विकी बुद्धि) का विषय और |