बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 421, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४१५
रोचिष्णुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेव मुपास्ते रोचिष्णुर्ह भवति रोचिष्णुर्हास्य प्रजा भवत्यथो यैः सन्निगच्छति सर्वाँ स्तानतिरोचते ॥ ६ ॥
वह गार्ग्य बोला, 'यह जो दर्पणमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी तो मैं रोचिष्णु (देदीप्यमान) रूपसे उपासना करता हूँ।' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है, वह निश्चय रोचिष्णु होता है, उसकी प्रजा भी रोचिष्णु होती है और उसका जिनसे सङ्गम होता है, उन सबसे बढ़कर वह दीप्तिमान् होता है ॥ ६ ॥
| आदर्श प्रसादस्वभावे चान्यत्र खड्गादौ हार्दे च सत्त्वशुद्धिस्वाभाव्ये चैका देवता; तस्या विशेषणम्—रोचिष्णुर्दीप्तिस्वभावः; फलं च तदेव । रोचनाधारबाहुल्यात्फलबाहुल्यम् ॥ ९ ॥ | स्वभावतः स्वच्छ दर्पण और ऐसे ही खड्गादि अन्य पदार्थोंमें तथा स्वभावतः शुद्ध सत्त्वयुक्त हृदयमें एक ही देवता है। उसका विशेषण रोचिष्णु अर्थात् दीप्तिशाली है तथा वही फल भी है। दीप्तिके आधारोंकी बहुलता होनेके कारण फलकी भी बहुलता है ॥ ६ ॥ |
गार्ग्यद्वारा प्राणब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान
स होवाच गार्ग्यो य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनूदेत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते सर्वँहैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालात्प्राणो जहाति ॥ १० ॥
वह गार्ग्य बोला, 'जानेवालेके पीछे जो यह शब्द उत्पन्न होता है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं,