भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 422
४१६बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

नहीं, इसके विषयमें बात मत करो। इसकी तो मैं प्राणरूपसे उपासना करता हूँ।' जो कोई इसकी इस प्रकार उपासना करता है वह इस लोकमें पूर्ण आयु प्राप्त करता है, इसे प्राण समयसे पहले नहीं छोड़ता ॥१०॥

| यन्तं गच्छन्तं य एवायं शब्दः पश्चात्पृष्ठतोऽनूदेत्यध्यात्मं च जीवनहेतुः प्राणः, तमेकीकृत्याह; असुः प्राणो जीवनहेतुरिति गुणस्तस्य फलम्—सर्वमायुरस्मिँल्लोक एतीति—यथोपात्तं कर्मणा आयुः, कर्मफलपरिच्छिन्नकालात्पुरा पूर्वं रोगादिभिः पीड्यमानमप्येनं प्राणो न जहाति ॥ १० ॥ | ‘यन्तम्’—जाते हुए [ वायु ] के पीछे जो यह शब्द उदित होता है और जो अध्यात्मपक्षमें जीवनका हेतुभूत प्राण है, उनको यहाँ एक करके कहा है। ‘असु-प्राण अर्थात् जीवनका हेतु’—यह उसका गुण है। उसका फल यह है कि वह इस लोकमें पूर्ण आयु प्राप्त करता है—उसे कर्मवश जितनी आयु प्राप्त होती है [ उसका वह भोग करता है ] । उसके कर्मफलसे मर्यादित समयसे पूर्व, रोगादिसे पीड़ित होनेपर भी, प्राण उसे नहीं छोड़ता ॥ १० ॥ |

गार्ग्यद्वारा दिग्ब्रह्मका प्रतिपादन और अजातशत्रुद्वारा उसका प्रत्याख्यान

स होवाच गार्ग्यो य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान्ह भवति नास्माद्गणश्छिद्यते ॥ ११॥

वह गार्ग्य बोला, 'यह जो दिशाओंमें पुरुष है, इसीकी मैं ब्रह्मरूपसे उपासना करता हूँ।' उस अजातशत्रुने कहा, 'नहीं, नहीं, इसके विषयमें बात मत करो; मैं इसकी द्वितीय और अनपगरूपसे उपासना करता हूँ।'