भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 432, कुल 1402 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 432

४२६ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २


| तथासौ प्राप्तशब्दादिविषयोपलब्धृस्वभावश्चेद् गार्ग्याभिप्रेतः प्राणो बृहन् पाण्डरवास इत्येवमादिशब्दं स्वं विषयमुपलभेत यथा प्राप्तं तृणोलपादि वह्निर्दहेत्प्रकाशयेच्चाव्यभिचारेण तद्वत्। तस्मात्प्राप्तानां शब्दादीनामप्रतिबोधादभोक्तृस्वभाव इति निश्चीयते। न हि यस्य यः स्वभावो निश्चितः, स तं व्यभिचरति कदाचिदपि। अतः सिद्धं प्राणस्याभोक्तृत्वम्। | जा सकता। इसी प्रकार यदि गार्ग्यका अभिमत प्राण अपनेको प्राप्त हुए शब्दोंको ग्रहण करनेके स्वभाववाला है तो अपने विषयभूत बृहन्, पाण्डरवास आदि शब्दको ग्रहण कर लेता, जिस प्रकार कि अपनेको प्राप्त हुए तृण-उलप आदिको अग्नि बिना अपवादके दग्ध और प्रकाशित कर देता है, उसी प्रकार [ यहाँ भी समझना चाहिये ]। अतः अपनेको प्राप्त हुए शब्दादिका ज्ञान न होनेसे यह निश्चय होता है कि प्राण भोक्तृस्वभाव नहीं है; क्योंकि जिसका जो निश्चित स्वभाव होता है वह उसको कभी नहीं त्यागता। इससे प्राणका अभोक्तृत्व ही सिद्ध होता है। | | सम्बोधनार्थनामविशेषेण सम्बन्धाग्रहणादप्रतिबोध इति चेत्? | पूर्वं०-सम्बोधनके लिये प्रयोग किये हुए नामविशेषसे अपना सम्बन्ध ग्रहण न करनेके कारण प्राणका अप्रतिबोध रहा हो तो ? अर्थात् यदि | | स्यादेतत्—यथा बहुष्वासीनेषु<br><br>स्वनामविशेषेण सम्बन्धाग्रहणा-<br><br>न्मायं सम्बोधयतीति, शृण्वन्नपि<br><br>सम्बोधयमानो विशेषतो न प्रति- | ऐसी बात हो कि जिस प्रकार बहुत-से बैठे हुए पुरुषोंमें अपने नामविशेषसे सम्बन्ध ग्रहण न करनेके कारण अर्थात् यह मुझे ही पुकारता है, ऐसा न समझ सकनेके कारण कोई पुरुष पुकारे जानेपर सुनते हुए भी विशेषरूपसे नहीं समझता, |