बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 433, कुल 1402 में से
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ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२७
| संस्कृत | हिन्दी |
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| पद्यते, तथेमानि बृहन्नित्येवमादीनि मम नामानीत्यगृहीतसम्बन्धत्वात्प्राणो न गृह्णाति सम्बोधनार्थं शब्दम्, न त्वविज्ञातृत्वादेवेति चेत् ? | उसी प्रकार 'ये बृहत् इत्यादि मेरे ही नाम हैं'—ऐसा सम्बन्ध ग्रहण न करनेके कारण प्राण अपनेको सम्बोधन करनेके लिये प्रयोग किये हुए शब्दोंको ग्रहण नहीं करता, अविज्ञाता होनेके कारण ही नहीं; तो ? |
| न; देवताभ्युपगमेऽग्रहणानुपपत्तेः। यस्य हि चन्द्राद्यभिमानिनी देवता अध्यात्मं प्राणो भोक्ता अभ्युपगम्यते, तस्य तथा संव्यवहाराय विशेषनाम्ना सम्बन्धोऽवश्यं ग्रहीतव्यः, अन्यथा आह्वानादिविषये संव्यवहारोऽनुपपन्नः स्यात् । | सिद्धान्ती—यह बात नहीं है, क्योंकि देवता माना जानेके कारण उसका नामसे सम्बन्ध ग्रहण न करना सम्भव नहीं है।^१ जिसके मतमें चन्द्र आदिका अभिमानी देवता अध्यात्म प्राण भोक्ता माना जाता है, उसके सिद्धान्तानुसार उस प्रकारके सम्यग् व्यवहारके लिये उसे अपने विशेष नामसे अवश्य सम्बन्ध ग्रहण करना चाहिये; नहीं तो आवाहन आदिके विषयमें ठीक-ठीक व्यवहार होना असम्भव होगा।^२ |
| व्यतिरिक्तपक्षेऽप्यप्रतिपत्तेरयुक्तमिति चेत् ? यस्य च प्राणव्यतिरिक्तो भोक्ता, तस्यापि बृहन्नित्यादिनामभिः सम्बोधने बृहत्त्वादिनाम्नां तदा तद्विषयत्वा- | पूर्व०—[ भोक्ताको प्राणादिसे ] व्यतिरिक्त माना जाय तब भी तो वह [ पुकारनेपर ] नहीं समझता, इसलिये तुम्हारा कथन ठीक नहीं है। अर्थात् जिसके मतमें भोक्ता प्राणसे भिन्न है, उसके सिद्धान्तानुसार भी जब उसे बृहन् इत्यादि नामोंसे पुकारा जाय तो |
१. क्योंकि देवता सर्वज्ञ होता है।
२. तात्पर्य यह है कि यदि चन्द्राभिमानी देवताको अपने अभिधायक नामके साथ अपने सम्बन्धका ज्ञान न होगा तो उसके उद्देश्यसे किये हुए आवाहन, स्तुति, याग एवं प्रणामादिकी सफलता नहीं होगी।