भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 434, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 434
४२८बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| त्प्रतिपत्तिर्युक्ता । न च कदाचिदपि बृहत्त्वादिशब्दैः सम्बोधितः प्रतिपद्यमानो दृश्यते । तस्मादकारणमभोक्तृत्वे सम्बोधनाप्रतिपत्तिरिति चेत् ? <br><br> न; तद्वतस्तावन्मात्राभिमानानुपपत्तेः । यस्य प्राणव्यतिरिक्तो भोक्ता स प्राणादिकरणवान्प्राणी । तस्य न प्राणदेवतामात्रेऽभिमानो यथा हस्ते । तस्मात्प्राणनामसम्बोधने कृत्स्नाभिमानिनो युक्तैवाप्रतिपत्तिः; न तु प्राणस्यासाधारणनामसंयोगे, देवतात्म- | उसे उसका ज्ञान होना चाहिये; क्योंकि उस समय बृहत्त्वादि नाम उसीको विषय करनेवाले होते हैं । किंतु उसे भी बृहत्त्वादि शब्दोंसे पुकारे जानेपर कभी उनका ज्ञान होता दिखायी नहीं देता । अतः सम्बोधनको न समझना यह अभोक्तृत्वमें कारण नहीं हो सकता—ऐसा कहें तो ? <br><br> सिद्धान्ती—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि प्राणादिमान्‌को केवल प्राणादिमात्रका अभिमान होना सम्भव नहीं है । जिसके मतमें भोक्ता प्राणादिसे भिन्न है [उसके सिद्धान्तानुसार ] वह प्राणादि इन्द्रियोंवाला प्राणी होना चाहिये । उसे प्राणदेवतामात्रमें [आत्मत्वका] अभिमान नहीं हो सकता, जैसे हाथमें [ हाथवालेका अभिमान नहीं होता]। अतः सम्पूर्ण शरीरके अभिमानीको, केवल प्राणका नाम लेकर पुकारे जानेपर उसमें अप्रतिपत्ति होना उचित ही है; किंतु प्राणका, उसके किसी असाधारण नामसे संयोग होनेपर न समझना युक्त नहीं है । १ आत्माको |


१. अभिप्राय यह है कि यदि कोई कहे 'बृहन्' 'पाण्डरवास' आदि नाम साधारण प्राणके वाचक नहीं हैं; अपितु प्राणाभिमानी देवताके वाचक हैं, इसलिये यदि उनके द्वारा किये हुए सम्बोधनको प्राणने ग्रहण नहीं किया तो कोई आपत्ति नहीं हो सकती—तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जिस प्रकार जातिवाचक गौ