भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 435, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 435

ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४२९


त्वानभिमानाच्चात्मनः।तो देवतात्मत्वका अभिमान न होनेके कारण [ इस प्रकारकी अप्रतिपत्ति हो सकती है ] ।
स्वनामप्रयोगेऽप्यप्रतिपत्तिदर्श-पूर्व०— अपने नामका प्रयोग
नाद्युक्तमिति चेत् ? सुषुप्तस्यकरनेपर भी अप्रतिपत्ति होती देखी
यल्लौकिकं देवदत्तादि नाम तेनापिजाती है, इसलिये ऐसा कहना उचित नहीं। अर्थात् सोये हुए पुरुषका
सम्बोध्यमानः कदाचिन्न प्रति-जो देवदत्तादि लौकिक नाम होता है उसके द्वारा पुकारे जानेपर भी कभी-
पद्यते सुषुप्तः । तथा भोक्तापिकभी सुषुप्त पुरुषको उसका ज्ञान नहीं होता, इसी प्रकार भोक्ता होते
सन्प्राणो न प्रतिपद्यत इति चेत् ?हुए भी प्राणको उसका ज्ञान नहीं होता—यदि ऐसी बात हो तो ?
न, आत्मप्राणयोः सुप्तासुप्तत्व-सिद्धान्ती— नहीं, क्योंकि शरीर और प्राणमें सुप्त और असुप्त रहने-
विशेषोपपत्तेः । सुषुप्तत्वात्प्राण-का भेद उपपन्न है। शरीर सोया रहता है, उसकी इन्द्रियाँ प्राणग्रस्त-
ग्रस्ततयोपरतकरण आत्मा स्वंरहनेके कारण निवृत्त हो जाती हैं; इसलिये उसे अपने नामका प्रयोग
नाम प्रयुज्यमानमपि न प्रति-किये जानेपर भी उसका ज्ञान नहीं होता। किंतु प्राण [ उस समय भी ]
पद्यते । न तु तदसुप्तस्य प्राणस्यनहीं सोता, इसलिये उसका भोक्तृत्व

शब्द प्रत्येक व्यक्तिका भी बोधन करता है, उसी प्रकार व्यापक प्राणको भी प्राणा- भिमानी वायु, चन्द्र इत्यादि देवताओंसे अभिन्न होनेका अभिमान होना ही चाहिये और उनके नामद्वारा पुकारे जानेपर उसकी प्रतिपत्ति भी होनी ही चाहिये । इस- पर यदि कोई कहे कि प्राणव्यतिरिक्त आत्मा भी तो व्यापक है, फिर प्राणाभिमानी देवताओंके नामोंसे उसे ही बोध क्यों नहीं होता ? तो इसके उत्तरमें आगेकी बात कही गयी है ।