बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 437, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 437
ब्राह्मण १ ] शाङ्करभाष्यार्थ ४३१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| नैव प्राणग्रस्तत्वात्करणान्तराणां प्रवृत्त्यनुपपत्तेर्भोक्तृत्वाशङ्कानुपपत्तिः। देवतान्तराभावाच्च। | ही अन्य इन्द्रियोंके भोक्तृत्वकी आशङ्का भी नहीं हो सकती, क्योंकि सुषुप्तिके समय प्राणमें ही लीन रहनेके कारण उनकी प्रवृत्ति होनी सम्भव नहीं है। तथा शरीरमें इनसे भिन्न कोई और देवता नहीं है; [ इसलिये देवतान्तरको भोक्ता मानना भी युक्तिसंगत नहीं है ] । |
| नन्वतिष्ठा इत्याद्यात्मन्वीत्यन्तेन ग्रन्थेन गुणवद्देवताभेदस्य दर्शितत्वादिति चेत् ? | पूर्व०—किंतु ‘अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानाम्’ से लेकर ‘आत्मन्वी ह भवति’ यहाँतकके ग्रन्थसे विशेष-विशेष गुणोंसे युक्त देवताका भेद दिखलाये जानेके कारण [ प्राणसे भिन्न कोई अन्य देवता नहीं है—ऐसा कहना उचित नहीं है ] । |
| न, तस्य प्राण एवैकत्वाभ्युपगमात्सर्वश्रुतिष्वरनाभिनिदर्शनेन। “सत्येनच्छन्नम् प्राणो वा अमृतम्” (बृ० उ० १।६।३) इति च प्राणबाह्यस्यान्यस्यानभ्युपगमाद्भोक्तुः; “एष उ ह्येव सर्वे देवाः” “कतम एको देव इति प्राणः” (३।९।९) इति च सर्वदेवानां प्राण एवैकत्वोपपादनाच्च। | सिद्धान्ती—ऐसा मत कहो, क्योंकि सारी श्रुतियोंमें अर और नाभिके दृष्टान्तद्वारा उनका प्राणमें ही एकत्व माना गया है। “सत्यसे आच्छादित है, प्राण ही अमृत है” इत्यादि वाक्योंसे प्राणसे बाह्य अन्य भोक्ता स्वीकार नहीं किया गया, तथा “यही समस्त देवगण है” “वह एक देव कौन है ? प्राण” इस वाक्यसे भी प्राणमें ही समस्त देवताओंके एकत्वका उपपादन किया गया है। |
| तथा करणभेदेष्वनाशङ्का, देहभेदेष्विव स्मृतिज्ञानेच्छादि- | इसी प्रकार नेत्रादि विभिन्न इन्द्रियोंमें भी भोक्तृत्वकी आशङ्का नहीं हो सकती, क्योंकि विभिन्न देहोंके समान उनमें स्मृति-ज्ञान एवं इच्छादिका |