भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 438, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 438

४३२ बृहदारण्यकोपनिषद् [अध्याय २


संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
प्रतिसन्धानानुपपत्तेः; न ह्यन्यदृष्टमन्यः स्मरति जानातीच्छति प्रतिसन्दधाति वा। तस्मान्न करणभेदविषया भोक्तृत्वाशङ्काविज्ञानमात्रविषया वा कदाचिदप्युपपद्यते।प्रतिसन्धान होना सम्भव नहीं है। अन्य पुरुषके देखे हुए पदार्थके विषयमें कोई दूसरा पुरुष स्मरण, जानकारी, इच्छा अथवा प्रतिसन्धान नहीं करता इसलिये विभिन्न इन्द्रियोंके विषयमें अथवा विज्ञानमात्रके विषयमें भोक्तृत्वकी आशङ्का होनी कभी उचित नहीं है।
ननु सङ्घात एवास्तु भोक्ता, किं व्यतिरिक्तकल्पनयेति ?पूर्व०-अच्छा तो संघातको ही भोक्ता मान लिया जाय, उससे भिन्न भोक्ताकी कल्पना करनेकी क्या आवश्यकता है ?
न; आपेषणे विशेषदर्शनात् । यदि हि प्राणशरीरसङ्घातमात्रो भोक्ता स्यात्सङ्घातमात्राविशेषात्सदा आपिष्टस्यानापिष्टस्य च प्रतिबोधे विशेषो न स्यात् । सङ्घातव्यतिरिक्ते तु पुनर्भोक्तरि सङ्घातसम्बन्धविशेषानेकत्वात् पेषणापेषणकृतवेदनायाः सुख-सिद्धान्ती-ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि उसे हाथसे दबानेपर विशेष अनुभव होता देखा जाता है। यदि प्राण और शरीरका संघात ही भोक्ता होता तो [ जागने और न जागनेके समय ] संघातमात्रमें सदा ही कोई अन्तर न होनेके कारण उसे दबाया जाय अथवा न दबाया जाय उसके जागे रहनेमें कोई विशेषता नहीं होनी चाहिये। किंतु यदि भोक्ता संघातसे भिन्न होगा तो संघातके साथ उसके सम्बन्धविशेषोंकी अनेकता होनेके कारण दबाने या न दबानेसे होनेवाले ज्ञान तथा उत्तम, मध्यम और
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