भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 516, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 516
५१०बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय २

| प्राणा वै यशो विश्वरूपम्—प्राणाः श्रोत्रादयो वायवश्च मरुतः सप्तधा तेषु प्रसृता यशः--इत्येतदाह मन्त्रः, शब्दादज्ञानहेतुत्वात् ।<br><br>तस्यासत ऋषयः सप्त तीर इति—प्राणाः परिस्पन्दात्मकाः, त एव च ऋषयः प्राणानेतदाह मन्त्रः। वागष्टमी ब्रह्मणा संविदानेति—ब्रह्मणा संवादं कुर्वती अष्टमी भवति; तद्धेतुमाह—वाग्ध्यष्टमी ब्रह्मणा संवित्त इति ॥ ३ ॥ | प्राण ही अनेक रूपोंवाला यश है। प्राण अर्थात् सात श्रोत्रादि^१ और उनमें सात भागोंमें विभक्त होकर फैले हुए मरुत् यानी वायु यश हैं—ऐसा मन्त्र कहता है, क्योंकि वे (श्रोत्रादि) शब्दादि विषयोंके ज्ञानके हेतु हैं।<br><br>उसके तीरपर सात ऋषि रहते हैं—यहाँ स्फुरणात्मक प्राण ही समझने चाहिये, वे ही ऋषि हैं, प्राणोंके विषयमें ही मन्त्र ऐसा कहता है। आठवीं वाक् वेदके द्वारा संवाद करती है। वह वेदके द्वारा संवाद करनेवाली वाक् आठवीं है। इसीसे कहा है—'वाक् ही आठवीं है, वह वेदके द्वारा संवाद करती है' इति ॥ ३ ॥ |

श्रोत्रादिमें विभागपूर्वक सप्तर्षि-दृष्टि

के पुनस्तस्य चमसस्य तीर आसत ऋषय इति ।किंतु उस चमसके तीरपर कौन ऋषि रहते हैं, सो बतलाते हैं—

इमावेव गोतमभरद्वाजावयमेव गोतमोऽयं भरद्वाज इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी अयमेव विश्वामित्रोऽयं जमदग्निरिमावेव वसिष्ठकश्यपावयमेव वसिष्ठोऽयं कश्यपो वागेवात्रिर्वाचा ह्यन्नमद्यतेऽत्तिर्ह वै नामैतद्यदत्रिरिति सर्वस्यात्ता भवति सर्वमस्यान्नं भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥


१. दो कान, दो नेत्र, दो नासिका और एक रसना—ये सात श्रोत्रादि हैं।