भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 517, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 517

ब्राह्मण २] शाङ्करभाष्यार्थ ५११


ये दोनों [कान] ही गोतम और भरद्वाज हैं; यह ही गोतम है और यह [दूसरा] भरद्वाज है। ये दोनों [नेत्र] ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं; यह ही विश्वामित्र है और यह दूसरा जमदग्नि है। ये दोनों [नासारन्ध्र] ही वसिष्ठ और कश्यप हैं; यह ही वसिष्ठ है और यह दूसरा कश्यप है। तथा वाक् ही अत्रि है; क्योंकि वागिन्द्रियद्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है। जिसे अत्रि कहते हैं, वह निश्चय 'अत्ति' नामवाला ही है। जो इस प्रकार जानता है, वह सबका अत्ता (भक्षण करनेवाला) होता है, सब इसका अन्न हो जाता है ॥ ४ ॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
इमावेव गोतमभरद्वाजौ कर्णौ—<br>अयमेव गोतमोऽयं भरद्वाजो दक्षिणश्चोत्तरश्च, विपर्ययेण वा। त चक्षुषी उपदिशन्नुवाच—इमावेव विश्वामित्रजमदग्नी दक्षिणं विश्वामित्रउत्तरं जमदग्निंविपर्ययेण वा।<br>इमावेव वसिष्ठकश्यपौ—नासिके उपदिशन्नुवाच; दक्षिणः पुटो भवति वसिष्ठः, उत्तरः कश्यपः पूर्ववत्। वागेवात्रिः अदनक्रियायोगात्सप्तमः; वाचा ह्यन्नमद्यते तस्मादत्तिर्ह वै प्रसिद्धं नामैतत्—ये दोनों कर्ण ही गोतम और भरद्वाज हैं। ये दक्षिण और उत्तर कर्ण ही क्रमशः अथवा विपरीत क्रमसे गोतम और भरद्वाज हैं। इसी प्रकार नेत्रोंके विषयमें उपदेश करते हुए मन्त्रने कहा है कि ये ही विश्वामित्र और जमदग्नि हैं। इनमें दक्षिण नेत्र विश्वामित्र हे और वाम नेत्र जमदग्नि है, अथवा इससे विपरीत क्रमसे समझना चाहिये। फिर नासारन्ध्रोंके विषयमें उपदेश करते हुए मन्त्रने कहा है कि ये ही दोनों वसिष्ठ और कश्यप हैं; पूर्ववत् दायाँ छिद्र वसिष्ठ है और बायाँ कश्यप है। अदन (भक्षण) क्रियाका सम्बन्ध होनेके कारण वाक् ही सप्तम ऋषि अत्रि है; क्योंकि वागिन्द्रियके द्वारा ही अन्न भक्षण किया जाता है; अतः यह प्रसिद्ध अत्ति नामवाला है अर्थात्