बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 518, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें५१२ बृहदारण्यकोपनिषद् [ अध्याय २
| अत्तृत्वादत्तिरिति, अत्तिरेव सन् यदत्रिरित्युच्यते परोक्षेण । <br><br> सर्वस्यैतस्यान्नजातस्य प्राणस्यात्रिनिर्वचनविज्ञानादत्ता भवति । अत्तैव भवति नामुष्मिन्नन्नेन पुनः प्रतिपद्यत इत्येतदुक्तं भवति--सर्वमस्यान्नं भवतीति । य एवमेतद्यथोक्तं प्राणयाथात्म्यं वेद, स एवं मध्यमः प्राणो भूत्वा आधान-प्रत्याधानगतो भोक्तैव भवति, न भोज्यम्, भोज्याद् व्यावर्तत इत्यर्थः ॥ ४ ॥ | अत्ता होनेके कारण यह 'अत्ति' है; जो कि 'अत्ति' होते हुए ही परोक्ष-रूपसे 'अत्रि' कहा जाता है। <br><br> इस 'अत्रि' शब्दकी निरुक्तिका ज्ञान होनेसे पुरुष प्राणके इस सम्पूर्ण अन्नसमुदायका अत्ता (भक्षण करने-वाला) होता है। यह अन्न भक्षण करनेवाला ही होता है, परलोकमें पुनः अन्नसे युक्त नहीं होता; 'सर्वमस्यान्नं भवति' इस वाक्यसे यही बात कही गयी है। जो इस प्रकार इस उपर्युक्त प्राणके यथार्थ स्वरूपको जानता है, वह इस तरह मध्यम प्राण होकर आधान-प्रत्याधानगत भोक्ता ही होता है, भोज्य नहीं होता अर्थात् भोज्यवर्गसे निवृत्त हो जाता है ॥ ४ ॥ |
इति बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्ये द्वितीयाध्याये
द्वितीयं शिशुब्राह्मणम् ॥ २ ॥
तृतीय ब्राह्मण
| तत्र प्राणा वै सत्यमित्युक्तम् । याः प्राणानामुपनिषदः, ता ब्रह्मोपनिषत्प्रसङ्गेन व्याख्याताः--एते ते प्राणा इति च । ते किमात्मकाः ? | ऊपर यह कहा गया है कि प्राण ही सत्य हैं। जो प्राणोंकी उपनिषदें हैं, उनकी 'वे ये प्राण हैं' ऐसा कहकर ब्रह्मोपनिषद्के प्रसङ्गसे व्याख्या कर दी गयी है। अब यह बतलाना है कि उनका स्वरूप क्या |