बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 528, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५२२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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यह स्थित है, यह सत् है। यह जो नेत्र है वही इस मूर्तका, इस मर्त्यका, इस स्थितका एवं इस सत्का सार है यह सत्का ही सार है ॥ ४ ॥
| अथाधुनाध्यात्मं मूर्तामूर्तयोर्विभाग उच्यते—किं तन्मूर्तम् ! इदमेव, किं चेदम् ! यदन्यत्प्राणाच्च वायोर्यश्चायमन्तरभ्यन्तरे आत्मन्नात्मन्याकाशः खं शरीरस्थश्च यः प्राण एतद् द्वयं वर्जयित्वा यदन्यच्छरीरारम्भकं भूतत्रयम्, एतन्मर्त्यमित्यादि समानमन्यत्पूर्वेण । | अथ-अब मूर्तामूर्तका अध्यात्म-विभाग बतलाया जाता है—वह मूर्त क्या है ? यह ही है, यह क्या है ? जो प्राणवायुसे भिन्न है अर्थात् इस आत्मा—शरीरके भीतर जो आकाश है और जो देहस्थ प्राण है इन दोनोंको छोड़कर जो शरीरके आरम्भक तीन भूत हैं वे ही मर्त्य हैं—इस प्रकार अन्य सब पूर्ववत् समझना चाहिये । | | एतस्य सतो ह्येष रसः--यच्चक्षुरिति;आध्यात्मिकस्य शरीरारम्भकस्य कार्यस्यैष रसः सारः;तेन हि सारेण सारवदिदं शरीरं समस्तं यथाधिदैवतमादित्यमण्डलेन । | इस सत्का हो, यह जो चक्षु है, रस है । अर्थात् आध्यात्मिक यानी शरीरारम्भक भूतोंका यही रस यानी सार है; जिस प्रकार अधिदैवत मूर्त-वर्ग आदित्यमण्डलके कारण सारवान् है, उसी प्रकार यह समस्त शरीर उस सारसे ही सारवान् है । | | प्राथम्याच्च--चक्षुषी एव प्रथमे सम्भवतः सम्भवत इति। "तेजो रसो निरवर्तताग्निः"इति लिङ्गात्; तैजसं हि चक्षुः; एतत्सारम् आध्यात्मिकं भूतत्रयम्; सतो | [शरीरके अवयवोंमें] प्रथम होनेके कारण भी चक्षु सार हैं । उत्पन्न होनेवाले जीवके सबसे पहले नेत्र ही उत्पन्न होते हैं । इस विषयमें "अग्नि तेजरूप रसवाला हुआ" यह लिङ्ग है । चक्षु भी तैजस ही हैं, आध्यात्मिक भूतत्रय चक्षुरूप सारवाले ही हैं । 'यह सत्का ही रस है' यह |