भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 529, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 529

ब्राह्मण ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ५२३


ह्येष रस इति मूर्तत्वसारत्वे हेत्वर्थः ॥ ४ ॥कथन सत् (तीनों भूतों) का चक्षुके मूर्तत्व एवं सारत्वमें हेतुत्व-प्रतिपादन करनेके लिये है¹ ॥४॥

अध्यात्म अमूर्तका उसके विशेषणोंसहित वर्णन

अथामूर्तं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाश एतदमृत-
मेतद्यदेतत्त्यत्तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्यामृतस्यैतस्य यत
एतस्य त्यस्यैष रसो योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषस्तस्य
ह्येष रसः ॥ ५ ॥

अब अमूर्तका वर्णन करते हैं—प्राण और इस शरीरके अन्तर्गत जो आकाश है, वे अमूर्त हैं, यह अमृत है, यह यत् है और यही त्यत् है। उस इस अमूर्तका, इस अमृतका, इस यत्का, इस त्यत्का यह रस है जो कि यह दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है यह त्यत्का ही रस है ॥ ५ ॥

अथाधुनामूर्तमुच्यते। यत्परिशेषितं भूतद्वयं प्राणश्च यश्चायमन्तरात्मन्नाकाशः, एतदमूर्तम्। अन्यत्पूर्ववत् । एतस्य त्यस्यैष रसः सारः, योऽयं दक्षिणेऽक्षन्पुरुषः-दक्षिणेऽक्षन्निति विशेषग्रहणम्, शास्त्रप्रत्यक्षत्वात्; लिङ्गस्य हि दक्षिणेऽक्षिण विशेषतोऽधिष्ठातृत्वं शास्त्रस्य प्रत्यक्षं सर्वश्रुतिषुअथ-अब अमूर्तका वर्णन किया जाता है। जो बचे हुए दो भूत प्राण और यह देहान्तर्गत आकाश हैं, वे अमूर्त हैं। शेष अर्थ पूर्ववत् है। इस त्यत्का यह रस यानी सार है, जो कि यह दक्षिण नेत्रान्तर्गत पुरुष है, 'दक्षिण नेत्रमें' इस प्रकार विशेष नेत्रका ग्रहण शास्त्रप्रत्यक्ष होनेके कारण है। लिङ्गदेहका विशेषरूपसे दक्षिण नेत्रमें अधिष्ठातृत्व है, ऐसा शास्त्रका प्रत्यक्ष है, क्योंकि समस्त श्रुतियोंमें ऐसा ही प्रयोग देखा गया

१. तात्पर्य यह है कि चक्षु मूर्त है, अतः उसका तीनों मूर्त भूतोंका कार्य होना उचित ही है; क्योंकि वह मूर्तके समान धर्मवाला है तथा देहके सम्पूर्ण अवयवोंमें प्रधान होनेके कारण वह आध्यात्मिक तीनों भूतोंका रस—सार है—यह सिद्ध होता है।

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