भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 539, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 539

ब्राह्मण ३] शाङ्करभाष्यार्थं ५३३


शाङ्करभाष्यम्भाष्यार्थ
यथा च लोके पाण्ड्वाविकम्, अवेरिदम् आविकम् ऊर्णादि, यथा च तत्पाण्डुरं भवति, तथान्यद्वासनारूपम् । यथा च लोके इन्द्रगोपोऽत्यन्तरक्तो भवति एवमस्य वासनारूपम्। क्वचिद्विषयविशेषापेक्षया रागस्य तारतम्यम्, क्वचित्पुरुषचित्तवृत्त्यपेक्षया।तथा लोकमें जिस प्रकार पाण्डु आविक (सफेद ऊन) होता है, अवि (भेड़) के विकार ऊन आदिको आविक कहते हैं, जिस प्रकार वह पाण्डुर (श्वेतवर्ण) होता है, उसी प्रकार दूसरी वासनाका रूप है। इसी प्रकार लोकमें जैसे इन्द्रगोप कीड़ा अत्यन्त लाल रंगका होता है, वैसा ही इस पुरुषकी वासनाका भी रूप होता है। यहाँ कहीं तो विषयविशेषकी अपेक्षासे रागका तारतम्य है और कहीं पुरुषकी चित्तवृत्तिकी अपेक्षासे है।
यथा च लोकेऽग्न्यर्चिर्भास्वरं भवति, तथा क्वचित्कस्यचिद्वासनारूपं भवति। यथा पुण्डरीकं शुक्लम्, तद्वदपि च वासनारूपं कस्यचिद्भवति। यथा सकृद्विद्युत्तम्, यथा लोके सकृद्विद्योतनं सर्वतः प्रकाशकं भवति, तथा ज्ञानप्रकाशविवृद्ध्यपेक्षया कस्यचिद्वासनारूपमुपजायते। नैषां वासनारूपाणामादिरन्तो मध्यं सङ्ख्या वा, देशः कालो निमित्तं वावधार्यते—असङ्ख्येयत्वाद्वास-तथा लोकमें जिस प्रकार अग्निकी ज्वाला दीप्तिमती होती है, वैसे ही कहीं-कहीं किसीकी वासनाओंका रूप भी होता है। और जिस तरह पुण्डरीक (श्वेत कमल) सफेद रंगका होता है, उस प्रकार भी किसीकी वासनाओंका रूप होता है। जिस प्रकार सकृद्विद्युत्—लोकमें बिजलीका एक बार चमकना सब ओर प्रकाश करनेवाला होता है, वैसे ही ज्ञानरूप प्रकाशकी वृद्धिकी अपेक्षासे किसीकी वासनाका रूप हो जाता है। वासनाके इन रूपोंके आदि, अन्त, मध्य, संख्या अथवा देश, काल या निमित्तका कोई निश्चय नहीं किया जा सकता, क्योंकि वासनाएँ अगणित हैं और