भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 540, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 540
५३४बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय २

| नायाः, वासनाहेतूनां चानन्त्यात् तथा च वक्ष्यति षष्ठे—"इदंमयोऽदोमयः" (४।४।५) इत्यादि।<br><br>तस्मान्न स्वरूपसङ्ख्यावधारणार्था दृष्टान्ताः—'यथा माहारजनं वासः' इत्यादयः, किं तर्हि ? प्रकारप्रदर्शनार्थाः—एवम्प्रकाराणि हि वासनारूपाणीति। यत्तु वासनारूपमभिहितमन्ते—सकृद्विद्योतनमिवेति, तत्किल हिरण्यगर्भस्य अव्याकृतात्प्रादुर्भवतः तडिद्वत्सकृदेव व्यक्तिर्भवतीति; तत्तदीयं वासनारूपं हिरण्यगर्भस्य यो वेद तस्य सकृद्विद्युत्तेव, ह वै इत्यवधारणार्थौ, एवमेवास्य श्रीः ख्यातिर्भवतीत्यर्थः; यथा हिरण्यगर्भस्य—एवमेतद्यथोक्तं वासनारूपमन्त्यं यो वेद। | वासनाओंके हेतुओंका भी कोई अन्त नहीं है; जैसा कि छठे (उपनिषद्के चौथे) अध्यायमें "इदंमयः अदोमयः" आदि श्रुति बतलावेगी।<br><br>अतः 'जिस प्रकार माहारजन वस्त्र होता है' इत्यादि दृष्टान्त स्वरूप-संख्याका निश्चय करनेके लिये नहीं हैं; तो फिर किसलिये हैं? रूपोंका प्रकार प्रदर्शित करनेके लिये हैं अर्थात् वासनाके रूप इस-इस प्रकारके हैं—यह दिखानेके लिये हैं। अन्तमें जो 'एक बार बिजलीके चमकनेके समान' वासनाका रूप दिखाया गया है, वह यह दिखानेके लिये है कि अव्याकृतसे प्रादुर्भूत होते हुए हिरण्यगर्भकी बिजलीके समान एक बार ही अभिव्यक्ति होती है। अतः जो उस हिरण्यगर्भकी वासनाके रूपको जानता है, उसकी सकृद्विद्युत्ता-सी होती है। यहाँ 'ह' और 'वै'—ये दोनों निपात निश्चयार्थक हैं। तात्पर्य यह है कि इस प्रकार जो वासनाके इस अन्तिम रूपको जानता है, उसकी इसी प्रकार श्री यानी ख्याति होती है, जैसी कि हिरण्यगर्भकी। |

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