बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 558, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५५० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| पत्युर्भर्तुः कामाय प्रयोजनाय जायायाः पतिः प्रियो न भवति, किं तर्ह्यात्मनस्तु कामाय प्रयोजनायैव भार्यायाः पतिः प्रियो भवति । तथा न वा अरे जायाया इत्यादि समानमन्यत्, न वा अरे पुत्राणाम्, न वा अरे वित्तस्य, न वा अरे ब्रह्मणः, न वा अरे क्षत्रस्य, न वा अरे लोकानाम्, न वा अरे देवानाम्, न वा अरे भूतानाम्, न वा अरे सर्वस्य, पूर्वं पूर्वं यथासन्ने प्रीतिसाधने वचनम्; तत्र तत्रेष्टतरत्वाद्वैराग्यस्य; सर्वग्रहणमुक्तानुक्तार्थम् । <br><br> तस्माल्लोकप्रसिद्धमेतत्—आत्मैव प्रियः, नान्यत् । 'तदेतत्प्रेयः पुत्रात्' इत्युपन्यस्तम्, तस्यैतद् वृत्तिस्थानीयं प्रपञ्चितम् । तस्मादात्मप्रीतिसाधनत्वाद्गौणी अन्यत्र प्रीतिः, आत्मन्येव मुख्या । तस्मा- | कि पति यानी भर्ताके प्रयोजनसे स्त्रीको पति प्रिय नहीं होता । तो फिर क्या बात है ? अपने लिये अर्थात् अपने ही प्रयोजनके लिये स्त्रीको पति प्रिय होता है। इसी प्रकार 'न वा अरे जायायै' इत्यादि शेष वाक्यका अर्थ भी इसीके समान समझना चाहिये। अर्थात् हे मैत्रेयि ! न पुत्रोंके, न धनके, न ब्राह्मणके, न क्षत्रियके, न लोकके, न देवोंके, न भूतोंके और न अन्य सभीके प्रयोजनके लिये वे प्रिय होते । यहाँ जो-जो प्रीतिके समीपतर साधन हैं, उनका पहले-पहले वर्णन किया है; क्योंकि उन-उनमें ही वैराग्य अधिकाधिक अभीष्ट है 'सर्व' शब्दका ग्रहण कहे और न कहे हुए सभी साधनोंको सूचित करनेके लिये है। <br><br> अतः यह लोकमें प्रसिद्ध है कि आत्मा ही प्रिय है, अन्य कुछ नहीं। इसका 'तदेतत्प्रेयः पुत्रात्' इस वाक्यसे उल्लेख किया है, उसी वाक्यका यह व्याख्यारूप वचन कहा है। अतः, आत्माकी प्रीतिका साधन होनेके कारण, जो अन्यत्र प्रीति है यह गौणी है, आत्मामें ही मुख्य प्रीति है। अतः हे मैत्रेयि ! आत्मा |
१. वह यह आत्मा पुत्रसे प्रिय है।