भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 559, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 559

ब्राह्मण ४] शाङ्करभाष्यार्थ ५५१


शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
दात्मा वै अरे द्रष्टव्यो दर्शनार्हः, दर्शनविषयमापादयितव्यः; श्रोतव्यः पूर्वमाचार्यत आगमतश्च; पश्चान्मन्तव्यस्तर्कतः; ततो निदिध्यासितव्यो निश्चयेन ध्यातव्यः; एवं ह्यसौ दृष्टो भवति श्रवणमनननिदिध्यासनसाधनैर्निर्वर्तितैः । यदैकत्वमेतान्युपगतानि, तदा सम्यग्दर्शनं ब्रह्मैकत्वविषयं प्रसीदति, नान्यथा श्रवणमात्रेण ।ही द्रष्टव्य—दर्शन करने योग्य अर्थात् साक्षात्कारका विषय करने योग्य है, तथा पहले आचार्य और शास्त्रद्वारा श्रवण करनेयोग्य एवं पीछे तर्कद्वारा मनन करने योग्य है, इसके पश्चात् वह निदिध्यासितव्य अर्थात् निश्चयसे ध्यान करने योग्य है। क्योंकि इस प्रकार श्रवण, मनन एवं निदिध्यासनरूप साधनोंके सम्पन्न होनेपर ही इसका साक्षात्कार होता है। जिस समय इन सब साधनोंकी एकता होती है, उसी समय ब्रह्मैकत्वविषयक सम्यक् दर्शनका प्रसाद होता है । अन्यथा केवल श्रवणमात्रसे उसकी स्फुटता नहीं होती ।
यद्ब्रह्मक्षत्रादि कर्मनिमित्तं वर्णाश्रमादिलक्षणम् आत्मन्यविद्याध्यारोपितप्रत्ययविषयं क्रियाकारकफलात्मकमविद्याप्रत्ययविषयम्—रज्ज्वामिव सर्पप्रत्ययः, तदुपमर्दनार्थम् आह—आत्मामें अविद्यासे आरोपित प्रतीतिका विषयभूत जो ब्राह्मण और क्षत्रियादि वर्णाश्रमादिरूप कर्मका निमित्त है, वह क्रिया, कारक और फलरूप तथा रज्जुमें आरोपित सर्पप्रतीतिके समान अविद्याजनित प्रतीतिका विषय है । उसकी निवृत्तिके लिये श्रुति कहती है—
आत्मनि खल्वरे मैत्रेयि दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितं विज्ञातं भवति ॥ ५ ॥—हे मैत्रेयि ! आत्माका दर्शन, श्रवण, मनन और ज्ञान होनेपर निश्चय ही यह सब विदित अर्थात् ज्ञात हो जाता है ॥ ५ ॥
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