बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 568, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय २ |
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| श्रेय इच्छद्भिः, ज्ञानं वा कर्म वेति । | निरूपण किया है, कल्याणकामियोंको उसे वैसा ही समझना चाहिये। | | नामप्रकाशवशा हि रूपस्य विक्रियाव्यवस्था । नामरूपयोरेव हि परमात्मोपाधिभूतयोर्व्याक्रियमाणयोः सलिलफेनवत्तत्त्वान्यत्वेनानिर्वक्तव्ययोः सर्वावस्थयोः संसारत्वम्—इत्यतो नाम्न एव निश्वसितत्वमुक्तम्, तद्वचनेनैवेतरस्य निश्वसितत्वसिद्धेः । | रूपके विकारकी व्यवस्था नाम-प्रकाशके ही अधीन है। जल और फेनके समान जिनका वास्तविक अथवा अवास्तविक रूपसे निरूपण नहीं किया जा सकता; उन परमात्माके उपाधिभूत एवं विकारको प्राप्त होते हुए सम्पूर्ण अवस्थाओंमें स्थित नाम और रूपको ही संसार कहते हैं, इसलिये नामके ही निःश्वसित होनेका प्रतिपादन किया है; क्योंकि उसके निरूपणसे ही रूपका भी निःश्वसितत्व सिद्ध हो जाता है। | | अथवा सर्वस्य द्वैतजातस्य अविद्याविषयत्वमुक्तम्—"ब्रह्म तं परादात् ॰ ॰ ॰ 'इदं सर्वं यदयमात्मा" (२।४।६) इति । तेन वेदस्याप्रामाण्यमाशङ्क्यते । तदाशङ्कानिवृत्त्यर्थमिदमुक्तम् । पुरुषनिश्वासवदप्रयत्नोत्थितत्वात्प्रमाणं वेदः, न यथा अन्यो ग्रन्थ इति ॥ १० ॥ | अथवा "ब्राह्मणजाति उसे परास्त कर देती है...यह सब जो कुछ है आत्मा है" इस मन्त्रद्वारा सम्पूर्ण द्वैतवर्गको अविद्याका कार्य बतलाया है। इससे [अविद्याकल्पित सिद्ध होनेके कारण] वेदके अप्रामाणिक होनेकी आशङ्का होती है। उस आशङ्काकी निवृत्तिके लिये ही यह कहा है—पुरुषके निःश्वासके समान बिना प्रयत्नके उत्पन्न हुआ होनेके कारण वेद प्रमाण है, यह अन्य ग्रन्थकी तरह [पुरुषप्रयत्नजनित] नहीं है ॥ १० ॥ |