भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 569, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 569

ब्राह्मण ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ५६१

आत्मा ही सबका आश्रय है—इसमें दृष्टान्त

| किञ्चान्यत्, न केवलं स्थित्युत्पत्तिकालयोरेव प्रज्ञानव्यतिरेकेणाभावाज्जगतो ब्रह्मत्वम्, प्रलयकाले च। जलबुद्बुदफेनादीनामिव सलिलव्यतिरेकेणाभावः, एवं प्रज्ञानव्यतिरेकेण तत्कार्याणां नामरूपकर्मणां तस्मिन्नेव लीयमानानामभावः। तस्मादेकमेव ब्रह्म प्रज्ञानघनमेकरसं प्रतिपत्तव्यमित्यत आह। प्रलयप्रदर्शनाय दृष्टान्तः— | इसके सिवा दूसरी बात यह है कि जगत्‌का ब्रह्मत्व केवल उत्पत्ति और स्थितिकालमें ही प्रज्ञानको छोड़कर न रहनेके कारण नहीं है, अपि तु प्रलयकालमें भी है। जिस प्रकार जल, बुद्बुद और फेनादिकी सत्ता जलको छोड़कर नहीं है, उसी प्रकार प्रज्ञानसे भिन्न उसके कार्य और उसीमें लीन होनेवाले नाम, रूप और कर्मोंकी भी सत्ता नहीं है। इसलिये एक ही प्रज्ञानघन एकरस ब्रह्म है—ऐसा जानना चाहिये। इसीसे श्रुति [निम्नाङ्कित मन्त्र] कहती है। प्रलय प्रदर्शित करनेके लिये यहाँ दृष्टान्त दिया गया है— |

स यथा सर्वासामपाँ समुद्र एकायनमेवँ सर्वेषाँ स्पर्शानां त्वगेकायनमेवँ सर्वेषां गन्धानां नासिके एकायनमेवँ सर्वेषाँ रसानां जिह्वैकायनमेवँ सर्वेषाँ रूपाणां चक्षुरेकायनमेवँ सर्वेषाँ शब्दानाँ श्रोत्रमेकायनमेवँ सर्वेषाँ संकल्पानां मन एकायनमेवँ सर्वासां विद्यानाँ हृदयमेकायनमेवँ सर्वेषां कर्मणाँ हस्तावेकायनमेवँ सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवँ सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवँ सर्वेषामध्वनां पादावेकायनमेवँ सर्वेषां वेदानां वागेकायनम् ॥ ११ ॥


बृ० उ० ३६—