बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 598, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ५९० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय २ |
|---|
| तथा आकाशः । अध्यात्मं हृदयाकाशः ॥ १० ॥ | इसी प्रकार आकाश मधु है। अध्यात्मपुरुष हृदयाकाश है ॥ १० ॥ |
| आकाशान्ताः पृथिव्यादयो भूतगणा देवतागणाश्च कार्यकारणसङ्घातात्मान उपकुर्वन्तो मधु भवन्ति प्रति शरीरिणमित्युक्तम् । येन ते प्रयुक्ताः शरीरिभिः सम्बध्यमाना मधुत्वेनोपकुर्वन्ति तद्वक्तव्यमितीदमारभ्यते— | पृथिवीसे लेकर आकाशपर्यन्त भूतगण और देहेन्द्रियसङ्घातरूप देवगण उपकार करनेके कारण प्रत्येक देहधारीके लिये मधु होते हैं—ऐसा कहा गया। अब जिसके द्वारा प्रेरित होते हुए वे देहधारियोंसे सम्बद्ध होकर मधुरूपसे उनका उपकार करते हैं, उसका वर्णन करना है, इसलिये यह आरम्भ किया जाता है— |
अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् धर्मेतेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ११ ॥
यह धर्म समस्त भूतोंका मधु है तथा समस्त भूत इस धर्मके मधु हैं। इस धर्ममें जो यह तेजोमय अमृतमय पुरुष है और जो यह अध्यात्म-धर्मसम्बन्धी तेजोमय अमृतमय पुरुष है, यही वह है जो कि 'यह आत्मा है' [ इस वाक्यसे कहा गया है ]। यह अमृत है, यह ब्रह्म है, यह सर्व है ॥ ११ ॥
| अयं धर्मः—‘अयम्’ इत्यप्रत्यक्षोऽपि धर्मः कार्येण तत्प्रयुक्तेन प्रत्यक्षेण व्यपदिश्यते—अयं धर्म | यह धर्म मधु है। ‘अयम्’ (यह) इस पदका प्रयोग प्रत्यक्ष वस्तुके लिये होता है, यद्यपि धर्म प्रत्यक्ष नहीं है, तो भी उससे होनेवाले प्रत्यक्ष कार्यके कारण ‘अयं धर्मः’ इस प्रकार प्रत्यक्षवत् व्यव- |