बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ
पृष्ठ 599, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 599
ब्राह्मण ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ५९१
| शाङ्करभाष्यम् | भाष्यार्थ |
|---|---|
| इति प्रत्यक्षवत् । धर्मश्च व्याख्यातः श्रुतिस्मृतिलक्षणः, क्षत्रादीनामपि नियन्ता, जगतो वैचित्र्यकृत् पृथिव्यादीनां परिणामहेतुत्वात्, प्राणिभिरनुष्ठीयमानरूपश्च । तेन च 'अयं धर्मः' इति प्रत्यक्षेण व्यपदेशः । | हार किया जाता है। श्रुति-स्मृतिरूप धर्मकी व्याख्या तो की ही जा चुकी है, वह क्षत्रियादिका नियन्ता है, पृथिवी आदिके परिणामका हेतु होनेसे जगत्की विचित्रता करनेवाला है और प्राणियोंद्वारा पालन किया जाना ही इसका स्वरूप है। इस कारण भी 'यह धर्म' इस प्रकार प्रत्यक्षरूपसे उसका उल्लेख किया गया है। |
| सत्यधर्मयोश्चाभेदेन निर्देशः कृतः शास्त्राचारलक्षणयोः, इह तु भेदेन व्यपदेश एकत्वे सत्यपि, दृष्टादृष्टभेदरूपेण कार्यारम्भकत्वात् । यस्त्वदृष्टोऽपूर्वाख्यो धर्मः, स सामान्यविशेषात्मना अदृष्टेन रूपेण कार्यमारभते, सामान्यरूपेण पृथिव्यादीनां प्रयोक्ता भवति, विशेषरूपेण चाध्यात्मं कार्यकारणसङ्घातस्य । तत्र पृथिव्यादीनां प्रयोक्तरि यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजोमयः, तथाध्यात्मं कार्यकारणसङ्घातकर्तरि। धर्मे भवो धार्मः।११। | शास्त्र और आचाररूप सत्य और धर्मका अभेदरूपसे निर्देश किया गया है; किंतु एकत्व होनेपर भी यहां उसका भेदरूपसे व्यवहार किया गया है, क्योंकि दृष्ट और अदृष्टरूपसे वह कार्यका आरम्भक है। उनमें जो अपूर्वसंज्ञक अदृष्ट धर्म है, वह अपने सामान्य और विशेषात्मक अदृष्टरूपसे कार्यका आरम्भ करता है; वह सामान्यरूपसे पृथिवी आदिका प्रेरक होता है और विशेषरूपसे अध्यात्म देहेन्द्रियसंघातका। उनमेंसे पृथिवी आदिके प्रेरकके लिये 'यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजोमयः' यह वाक्य है और 'अध्यात्मम्' इत्यादि वाक्य देहेन्द्रियसंघातके कर्ताके लिये है। जो धर्ममें रहता है, उसे 'धार्म' कहते हैं ॥ ११ ॥ |