भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 658, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 658
६४८बृहदारण्यकोपनिषद्[अध्याय ३

| मृत्यूरुपभ्याम् । तथा चोक्तं "अशनाया हि मृत्युः" (बृ० उ० १ । २ । १) "एष एव मृत्युः" इति । आदित्यस्थं पुरुषमङ्गीकृत्याह "एको मृत्युर्बह्वेवा" इति च । <br><br> तदात्मभावापन्नो हि मृत्योरप्रिमतिमुच्यत इत्युच्यते । न च तत्र ग्रहातिग्रहौ मृत्युरूपौ न स्तः । "अथैतस्य मनसो द्यौः शरीरं ज्योतीरूपमसावादित्यः" ( बृ० उ० १ । ५ । १२) "मनश्च ग्रहः स कामेनातिग्राहेण गृहीतः" (३ । २ । ७) इति, वक्ष्यति "प्राणो वै ग्रहः सोऽपानेनातिग्राहेण" (३ । २ । २) इति, "वाग्वै ग्रहः स नाम्नातिग्राहेण" (३।२।३) इति च । तथा ऽन्नविभागे व्याख्यातमस्माभिः । सुविचारितं चैतद् यदेव प्रवृत्तिकारणं तदेव निवृत्तिकारणं न भवतीति । | अतिमुक्त (विशेषरूपसे मुक्त) नहीं है । इस विषयमें कहा भी है— "भूख ही मृत्यु है" "यही मृत्यु है" इत्यादि । आदित्यान्तर्गत पुरुषको अङ्गीकार करके श्रुति कहती है "एक ही मृत्यु बहुत प्रकारकी है।" <br><br> अग्न्यादिके तादात्म्यको प्राप्त हुआ पुरुष मृत्युकी प्राप्तिसे अतिमुक्त हो जाता है—ऐसा कहा जाता है; किंतु वहाँ मृत्युके रूप ग्रह और अतिग्रह न हों—ऐसी बात नहीं है । "तथा इस मनका द्युलोक शरीर है और ज्योतीरूप वह आदित्य है" "मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे गृहीत है" ऐसा श्रुति कहेगी भी, तथा "प्राण ही ग्रह है, वह अपानरूप अतिग्रहसे गृहीत है" और "वाक् ही ग्रह है, वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है" ऐसा भी श्रुति कहेगी । तीन अन्नोंका विभाग करते समय हमने इनकी ऐसी ही व्याख्या भी की है । तथा इस बातका भी अच्छी तरह विचार किया जा चुका है कि जो प्रवृत्तिका कारण होता है, वही निवृत्तिका भी कारण नहीं होता ।² |


१. उपनिषद्में 'मनो वै' पाठ है ।
२. अर्थात् कर्म तो फलभोगका निमित्त होनेके कारण बन्धनका ही कारण है, वह मुक्तिका कारण नहीं हो सकता ।