भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 659, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 659
ब्राह्मण २]शाङ्करभाष्यार्थ६४९
शाङ्करभाष्यभाष्यार्थ
केचित्तु सर्वमेव निवृत्तिकारणं मन्यन्ते। अतःकारणात् पूर्वस्मात् पूर्वस्मान्मृत्योर्मुच्यते उत्तरमुत्तरं प्रतिपद्यमानो व्यावृत्त्यर्थमेव प्रतिपद्यते न तु तादर्थ्यम्, इत्यत आ द्वैतक्षयात् सर्वं मृत्युः, द्वैतक्षये तु परमार्थतो मृत्योराप्तिमतिमुच्यते। अतश्च आपेक्षिकी गौणी मुक्तिरन्तराले । सर्वमेतद् एवम् अबार्हदारण्यकम् ।कोई-कोई तो सारे ही साधनोंको निवृत्तिका कारण मानते हैं। इस कारणसे उत्तरोत्तर उत्कृष्ट फलको प्राप्त होनेवाला कर्मठ भी पूर्व-पूर्व मृत्युसे मुक्त हो जाता है, अतः वह उस उत्कृष्ट फलको त्यागनेके लिये ही प्राप्त करता है, तद्रूप होनेके लिये नहीं। इस प्रकार द्वैतका क्षय होनेतक सब मृत्यु ही है, द्वैतका क्षय होनेपर तो वह परमार्थतः मृत्युकी प्राप्तिसे अतिमुक्त हो जाता है। इसलिये बीचमें जो मुक्ति बतलायी जाती है, वह आपेक्षिकी और गौणी ही है। इस प्रकार यह सब कल्पनाएँ बृहदारण्यकसे बाहरकी ही हैं।
ननु सर्वैकत्वं मोक्षः “तस्मात्तत्सर्वमभवत्” (बृ० उ० १ । ४ । १०) इति श्रुतेः।पूर्व०—किंतु सबकी एकता तो मोक्ष ही है, क्योंकि “इसलिये वह सर्व हो गया” ऐसी श्रुति है।
बाढं भव्येतदपि, न तु “ग्रामकामो यजेत, पशुकामो यजेत” इत्यादिश्रुतीनां तादर्थ्यम् । यदि ह्यद्वैतार्थत्वमेव आसां ग्रामपशुस्वर्गाद्यर्थत्वं नास्तीति ग्रामपशु-सिद्धान्ती—ठीक है, यह तो बृहदारण्यकका विषय है। परंतु “ग्रामकी इच्छावाला यजन करे, पशुओंकी इच्छावाला यजन करे” इत्यादि श्रुतियोंका तात्पर्य मोक्षमें नहीं हो सकता। यदि इनका तात्पर्य अद्वैतमें ही हो तो इनका ग्राम, पशु अथवा स्वर्गादिके लिये होना सम्भव नहीं है और इनसे