भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 660, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 660
६५०बृहदारण्यकोपनिषद्[ अध्याय ३

| स्वर्गादयो न गृह्येरन्, गृह्यन्ते तु कर्मफलवैचित्र्यविशेषाः । यदि च वैदिकानां कर्मणां तादर्थ्यमेव, संसार एव नाभाविष्यत् । | ग्राम, पशु और स्वर्गादिका ग्रहण भी नहीं होना चाहिये, परंतु कर्मफलवैचित्र्यरूप विशेषोंका ग्रहण होता ही है। यदि वैदिक कर्म मोक्षार्थ ही होते तो संसार ही नहीं रह सकता था ।^१ | | अथ तादर्थ्येऽपि अनुनिष्पादितपदार्थस्वभावः संसार इति चेत् । यथा च रूपदर्शनार्थ आलोके सर्वोऽपि तत्रस्थः प्रकाश्यत एव । | पूर्व०—यद्यपि कर्मश्रुति मोक्षार्थक है, तो भी उसके पीछे निष्पन्न हुए पदार्थका स्वभाव ही संसार है, जिस प्रकार कि प्रकाश रूपदर्शनके लिये होनेपर भी उससे वहाँ रखे हुए सभी पदार्थ प्रकाशित होते ही हैं। [ अतः कर्मके मोक्षार्थक होनेपर संसार ही नहीं रह सकता था, ऐसी शङ्का नहीं उठानी चाहिये ] । | | न; प्रमाणानुपपत्तेः। अद्वैतार्थत्वे वैदिकानां कर्मणां विद्यासहितानाम् अन्यस्यानुनिष्पादितत्वे प्रमाणानुपपत्तिः । न प्रत्यक्षं नानुमानमत एव च नागमः । | सिद्धान्ती—ऐसी बात नहीं है, क्योंकि इसमें कोई प्रमाण नहीं हो सकता। यदि ज्ञानसहित वैदिक कर्मोंको मोक्षार्थक माना जाय तो उनसे किसी अन्य पदार्थके अनुनिष्पन्न होनेमें कोई प्रमाण नहीं हो सकता। इसमें न प्रत्यक्ष प्रमाण हो सकता है न अनुमान और इसीसे आगम प्रमाण भी नहीं हो सकता । |


१. संसारका मूल तो कर्मफल ही है। उसीके भोगके लिये उत्तमाधम योनियोंकी प्राप्ति होती है। यदि कर्मोंका फल मोक्ष ही माना जाय तो फिर संसारका कोई कारण ही नहीं रहता ।