भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 667, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 667

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थ ६५७


वाक् ही ग्रह है, वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है, क्योंकि प्राणी वाक्‌से ही नामोंका उच्चारण करता है॥ ३॥ जिह्वा ही ग्रह है, वह रसरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी जिह्वासे ही रसोंको विशेषरूपसे जानता है ॥ ४ ॥ चक्षु ही ग्रह है, वह रूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी चक्षुसे ही रूपोंको देखता है ॥ ५ ॥ श्रोत्र ही ग्रह है, वह शब्दरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी श्रोत्रसे ही शब्दोंको सुनता है ॥ ६ ॥ मन ही ग्रह है, वह कामरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी मनसे ही कामोंकी कामना करता है ॥ ७ ॥ हस्त ही ग्रह हैं, वे कर्मरूप अतिग्रहसे गृहीत हैं; क्योंकि प्राणी हस्तसे ही कर्म करता है ॥ ८ ॥ त्वचा ही ग्रह है, वह स्पर्शरूप अतिग्रहसे गृहीत है; क्योंकि प्राणी त्वचासे ही स्पर्शोंको जानता है। इस प्रकार ये आठ ग्रह हैं और आठ अतिग्रह हैं ॥ ६ ॥

संस्कृतहिन्दी
वाग् वै ग्रहः—वाचा ह्यध्यात्मपरिच्छिन्नया आसङ्गविषयास्पद-या असत्यानृतासभ्यबीभत्सादि-वचनेषु व्यापृतया गृहीतो लोकोऽपहृतः, तेन वाग् ग्रहः। स नाम्नातिग्राहेण गृहीतः—स वागाख्यो ग्रहः; नाम्ना वक्तव्येन विषयेणातिग्रहेण, अतिग्राहेणेति दैर्घ्यं छान्दसं नाम। वक्तव्यार्था हि वाक्; तेन वक्तव्येनार्थेन तादर्थ्येन प्रयुक्ता वाक् तेन वशीकृता; तेन तत्कार्यमकृत्वा नैव तस्या मोक्षः। अतोवाक् ही ग्रह है; क्योंकि असत्य, अनृत, असभ्य एवं बीभत्सादि वचनोंमें प्रवृत्ता आसक्तिकी विषयभूता अध्यात्मपरिच्छिन्ना वाक्‌से ही गृहीत होकर लोक भूला हुआ है, इसलिये वाक् ग्रह है। वह नामरूप अतिग्रहसे गृहीत है—वह वाक्संज्ञक ग्रह नाम अर्थात् वक्तव्य विषयरूप अतिग्रहसे गृहीत है। ‘अतिग्रहेण' के स्थानमें ‘अतिग्राहेण' ऐसा दीर्घ प्रयोग छान्दस (वैदिकप्रक्रियाके अनुसार) है। वाक् वक्तव्य विषयके ही लिये होती है; उस वक्तव्य अर्थसे उसीके लिये प्रयुक्त होनेवाली वाक् उसीके वशीभूत है; अतः उस कार्यको किये बिना उसकी मुक्ति

बृ० उ० ४२-

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