बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 668, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६५८ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| नाम्नातिग्राहेण गृहीता वागित्युच्यते। वक्तव्यासङ्गेन हि प्रवृत्ता सर्वानर्थैर्युज्यते। समानमन्यत्। इत्येते त्वक्पर्यन्ता अष्टौ ग्रहाः स्पर्शपर्यन्ताश्चैतेऽष्टावतिग्रहा इति ॥ ३-९ ॥ | नहीं है। इसीसे यह कहा जाता है कि वाक् नामरूप अतिग्राहसे गृहीत है; क्योंकि वक्तव्यकी आसक्तिसे प्रवृत्त होनेपर वह समस्त अनर्थोंसे युक्त होती है। शेष मन्त्रोंका अर्थ इसीके समान है। इस प्रकार ये त्वक्पर्यन्त आठ ग्रह हैं और स्पर्शपर्यन्त आठ अतिग्रह हैं ॥ ३-६ ॥ |
सर्वभक्षक मृत्यु किसका खाद्य है ?
| उपसंहृतेषु ग्रहातिग्रहेषु आह पुनः— | ग्रह और अतिग्रहोंका उपसंहार हो जानेपर आर्तभाग फिर कहता है— |
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याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ सर्वं मृत्योरन्नं का स्वित् सा देवता यस्या मृत्युरन्नमित्यग्निर्वै मृत्युः सोऽपामन्नमप पुनर्मृत्युं जयति ॥ १० ॥
'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'यह जो कुछ है सब मृत्युका खाद्य है; सो वह देवता कौन है, जिसका खाद्य मृत्यु है।' [ इसपर याज्ञवल्क्य कहता है— ] 'अग्नि ही मृत्यु है, वह जलका खाद्य है। [ इस प्रकारके ज्ञानसे ] पुनर्मृत्युका पराजय होता है' ॥ १० ॥
| याज्ञवल्क्येति होवाच, यदिदं सर्वं मृत्योरन्नम्—यदिदं व्याकृतं सर्वं मृत्योरन्नम्, सर्वं जायते विपद्यते च ग्रहातिग्रहलक्षणेन मृत्युना ग्रस्तम्—का स्वित् का नु | 'हे याज्ञवल्क्य !' ऐसा आर्तभागने कहा, 'वह जो कुछ है, सब मृत्युका खाद्य है—यह जितना व्याकृत जगत् है, सब मृत्युका खाद्य है; क्योंकि ग्रहातिग्रहरूप मृत्युसे ग्रस्त होकर सब उत्पन्न होता और नाशको प्राप्त होता है, अतः वह |
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