बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 670, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६६० | बृहदारण्यकोपनिषद् | [अध्याय ३ |
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| दृष्टो मृत्युः, विनाशकत्वात्; सोऽद्भिर्भक्ष्यते सोऽग्निरपामन्नम्; गृहाण तर्ह्यस्ति मृत्योर्मृत्युरिति । तेन सर्वं ग्रहातिग्रहजातं भक्ष्यते मृत्योर्मृत्युना तस्मिन् बन्धने नाशिते मृत्युना भक्षिते संसारान्मोक्ष उपपन्नो भवति । बन्धनं हि ग्रहातिग्रहलक्षणमुक्तम्, तस्माच्च मोक्ष उपपद्यत इत्येतत् प्रसाधितम्; अतो बन्धमोक्षाय पुरुषप्रयासः सफलो भवति । अतोऽपजयति पुनर्मृत्युम् । १०। | होनेसे अग्नि मृत्युरूप देखा गया है, उसे जल भक्षण कर जाता है, अतः वह अग्नि जलका खाद्य है; अतः यह समझ लो कि मृत्युका मृत्यु भी है। उस मृत्युके मृत्युद्वारा सम्पूर्ण ग्रहातिग्रहसमुदाय भक्षण कर लिया जाता है। उस बन्धनको नष्ट कर देनेपर अर्थात् मृत्युद्वारा उसका भक्षण कर लिये जानेपर संसारसे मोक्ष होना सम्भव है। बन्धन ग्रहातिग्रहरूप कहा गया है और उससे मोक्ष होना भी सम्भव है—यह बात सिद्ध कर दी गयी है, अतः उस बन्धनकी निवृत्तिके लिये पुरुषका [ श्रवणादिरूप ] प्रयत्न सफल होता है। अतः [ ज्ञानके द्वारा ] पुरुष पुनर्मृत्युको जीत लेता है ॥ १० ॥ |
तत्त्वज्ञके देहावसानका क्रम
याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियत उद्-
स्मात् प्राणाः क्रामन्त्याहो३ नेति नेति होवाच याज्ञ-
वल्क्योऽत्रैव समवनीयन्ते स उच्छ्वयत्याध्मायत्या-
ध्मातो मृतः शेते ॥ ११ ॥
'हे याज्ञवल्क्य!' ऐसा आर्तभागने कहा, 'जिस समय यह मनुष्य मरता है, उस समय इसके प्राणोंका उत्क्रमण होता है या नहीं?' 'नहीं, नहीं,'