भारतकोश
बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,402 पृष्ठ

पृष्ठ 671, कुल 1402 में से

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पृष्ठ 671

ब्राह्मण २ ] शाङ्करभाष्यार्थे ६६१


ऐसा याज्ञवल्क्यने कहा, 'वे यहाँ ही लीन हो जाते हैं। वह फूल जाता है, अर्थात् वायुको भीतर खींचता है और वायुसे पूर्ण हुआ ही मृत होकर पड़ा रहता है'॥ ११॥

संस्कृत-भाष्यहिन्दी-अनुवाद
परेण मृत्युना मृत्यौ भक्षिते परमात्मदर्शनेन योऽसौ मुक्तो विद्वान् सोऽयं पुरुषो यत्र यस्मिन् काले म्रियते, उत् ऊर्ध्वम् अस्माद् ब्रह्मविदो म्रियमाणात्, प्राणाः—वागादयो ग्रहाः, नामादयश्चातिग्रहा वासनारूपा अन्तःस्थाः प्रयोजकाः क्रामन्त्यूर्ध्वम् उत्क्रामन्ति, आहोस्वन्नेति ?'परमात्मदर्शनरूप परमृत्युके द्वारा मृत्युके भक्षण कर लिये जानेपर जो यह मुक्त हुआ विद्वान् है, वह जब-जिस समय मरता है, उस समय इस मरनेवाले ब्रह्मवेत्तासे प्राण—वागादि ग्रह और नामादि अतिग्रह, जो वासनारूप और भीतर स्थित रहकर प्रेरणा करनेवाले हैं, उत्क्रमण करते हैं या नहीं?'
नेति होवाच याज्ञवल्क्यो नोत्क्रामन्ति, अत्रैवास्मिन्नेव परेणात्मनाविभागं गच्छन्ति विदुषि कार्याणि करणानि च स्वयोनौ परब्रह्मसतत्त्वे समवनीयन्ते एकीभावेन समवसृज्यन्ते, प्रलीयन्ते इत्यर्थः ऊर्मय इव समुद्रे। तथा च श्रुत्यन्तरं कलाशब्दवाच्यानां प्राणानां परस्मिन्नात्मनि प्रलयं दर्शयति—"एवमेवास्य परिद्रष्टुरिमाः षोडश कलाः पुरुषायणाः पुरुषं प्राप्यास्तं गच्छन्ति" (प्र० उ० ६। ५) इति।याज्ञवल्क्यने कहा, नहीं, वे उत्क्रमण नहीं करते। वे यहीं—इस परमात्मामें ही अभेदको प्राप्त हो जाते हैं अर्थात् इस विद्वान्‌में ये भूत और इन्द्रियवर्ग अपने मूलभूत परब्रह्मसत्तामें एकीभावसे विसृष्ट यानी लीन हो जाते हैं, जैसे कि समुद्रमें तरङ्गैं। इसी प्रकार "ऐसे ही इस सर्वद्रष्टाकी ये सोलह कलाएँ पुरुषायण हैं अर्थात् वे पुरुषको प्राप्त होकर अस्त हो जाती हैं" यह अन्य श्रुति भी कलाशब्दवाच्य प्राणोंका परमात्मामें लय दिखलाती है।
इति परेणात्मनाविभागं गच्छन्तीति दर्शितम्। न तर्हिइस प्रकार यह दिखलाया गया कि वे प्राण परमात्माके साथ अभेदको प्राप्त हो जाते हैं। तब तो यह