बृहदारण्यकोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Brihadaranyaka Upanishad with Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 672, कुल 1402 में से
संदर्भ में पढ़ें| ६६२ | बृहदारण्यकोपनिषद् | [ अध्याय ३ |
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| मृतः—न हि, मृतश्चायं यस्मात् स उच्छ्वयति—उच्छूनतां प्रतिपद्यते, आध्मायति बाह्येन वायुना पूर्यते दृतिवत्, आध्मातो मृतः शेते निश्चेष्टः। बन्धननाशे मुक्तस्य न क्वचिद्गमनमिति वाक्यार्थः ॥ ११ ॥ | कहना चाहिये कि वह मरता ही नहीं है; ऐसी बात नहीं है; यह मरता तो है; क्योंकि वह उच्छून-भावको प्राप्त होता है अर्थात् फूल जाता है। वह धोकनीके समान शरीरको बाह्य वायुसे भरता है और इस प्रकार भरकर मरा हुआ निश्चेष्ट पड़ा रहता है। इस वाक्यका तात्पर्य यह है कि बन्धनका नाश हो जानेपर मुक्त पुरुषका कहीं गमन नहीं होता ॥ ११ ॥ | | मुक्तस्य किं प्राणा एव समवनीयन्ते, आहोस्वित् तत्प्रयोजकमपि सर्वम् ? अथ प्राणा एव, न तत्प्रयोजकं सर्वम्, प्रयोजके विद्यमाने पुनः प्राणानां प्रसङ्गः, अथ सर्वमेव कामकर्मादि, ततो मोक्ष उपपद्यते, इत्येवमर्थ उत्तरः प्रश्नः । | तो क्या मुक्त पुरुषके केवल प्राणोंका ही लय होता है अथवा उसके सब प्रयोजकोंका भी ? यदि कहें कि प्राण ही लीन होते हैं, उसके सभी प्रयोजक लीन नहीं होते, तो प्रयोजकोंके विद्यमान रहते हुए पुनः प्राणोंकी प्राप्तिका प्रसंग हो जायगा और यदि काम-कर्मादि सभीका लय माना जाय तो ही उसका मोक्ष होना बन सकता है; इस बातको स्पष्ट करनेके लिये ही आगेका प्रश्न है— |
याज्ञवल्क्येति होवाच यत्रायं पुरुषो म्रियते किमेनं न जहातीति नामेत्यनन्तं वै नामानन्ता विश्वे देवा अनन्तमेव स तेन लोकं जयति ॥ १२ ॥